Monday, July 1, 2013

(भक्ति शतक ) जगदगुरु श्री कृपालुजी महाराज द्वारा रचित |

जैसे प्राकृत देह की , आत्मा ‘जीव’ बखान |
ऐसे ही जीव की , आत्मा ‘श्याम’ सुजान ||३४||

भावार्थ – जिस प्रकार पाँच भौतिक देह की आत्मा जीव है | ऐसे ही जीव रूप देह की आत्मा श्री कृष्ण हैं |

(भक्ति शतक )
जगदगुरु श्री कृपालुजी महाराज द्वारा रचित |

श्री महाराजजी के श्रीमुख से:

"श्री महाराजजी के श्रीमुख से:
एक बात बड़ी इंपोर्टेंट| हरि, गुरु को अपने साथ ,सर्वत्र ,सर्वदा महसूस करो। इसका अभ्यास करो। दस दिन ,बीस दिन, महीने, छ: महीने में यह अभ्यास पक्का हो जायेगा कि हम अकेले नहीं हैं। हम जहां अपने को अकेला मानते हैं वहीं पाप कर बैठते हैं - प्राइवेट| अरे, वेद कहता है, अगर तुम गुरु को न भी मानो तो भगवान को तो मानो कि अंत:करण में वो नित्य हमारे साथ है, हमारे आइडिया नोट कर रहा है। तो हरि-गुरु को अपने साथ अपना रक्षक मानो। यह फीलिंग हो - हम अकेले नहीं हैं,सदा वे हमारे साथ है।गलत काम न करें ,गलत चिंतन न करें । सावधानी आयेगी तो अपराध से बचेंगे।"

'JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ'..............

Our guruvar 'JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ'lovingly called 'Shri Maharajji' by devotees is grace and kindness personified.It means grace is all around,both inside and outside.This is how he truly is.the word 'kripalu' itself means one who showers grace and kindness all around.One may come to him with good intention or bad he will impart his grace on all regardless of their intention.It seems the whole existence of Guruvar is made of Grace.
Every moment of life whether he is sleeping or awake,he is bestowing his grace on all living beings.
The day we accept him as hundred percent 'Kripalu','the embodiment of Grace',we will attain our goal.
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ऐसे है हमारे महाराजजी...........

ऐसे है हमारे महाराजजी...........

कैसी तेज गति है उनकी एक क्षण भी अपना व्यर्थ नहीं जाने देते हैं। सर्दी गर्मी बरसात आँधी तूफान कैसा भी मौसम हो वे सदैव गतिशील ही रहते हैं। उनकी दिनचर्या में कोई अंतर नहीं होता कैसे भी परिस्थिति हो कैसा भी उनका स्वास्थ्य हो, अपने सुख को तो भूल ही गये हैं ,सदैव अपने शरणागत जीवों का सुख का ही चिंतन करते रहते हैं।

SHRI MAHARAJJI SAYS:

' गु ' शब्द का अर्थ माया का अन्धकार , ' रु ' शब्द का अर्थ नाश करना है। अर्थात जो माया रूपी अन्धकार का नाश कर दे वही गुरु है।
.......श्री महाराज जी।

JAGADGURU SHRI KRIPALU JI MAHARAJ SAYS:

सत्य अहिंसा आदि मन ! बिन हरिभजन न पाय |
जल ते घृत निकले नहीं , कोटिन करिय उपाय ||३५||

भावार्थ – सत्य अहिंसादि दैविगुण केवल श्रीकृष्ण भक्ति से ही मिल सकते हैं | जैसे पानी मथने से घी नहीं निकल सकता | ऐसे ही अन्य करोड़ों उपायों से दैविगुण नहीं मिलते |

(भक्ति शतक )
जगदगुरु श्री कृपालुजी महाराज द्वारा रचित |

HAPPY DOCTOR'S DAY FROM JAGADGURU KRIPALU CHIKITSALYA............

SALUTATIONS TO BEST SPIRITUAL DOCTOR OF THE UNIVERSE............
JAI SHRI MAHARAJJI...........JAI SHRI RADHEY-KRISHN.

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...