Saturday, August 24, 2013

हम साधकों को सदा यही समझना चाहिए कि हमसे जो अच्छा काम हो रहा है, वह गुरु एवं भगवान की कृपा से ही हो रहा है क्योंकि हम तो अनादिकाल से मायाबद्ध घोर संसारी, घोर निकृष्ट, गंदे आइडियास(ideas) वाले बिलकुल गंदगी से भरे पड़े हैं। हमसे कोई अच्छा काम हो जाये, भगवान के लिए एक आँसू निकल जाय, महापुरुष के लिए, एक नाम निकल जाये मुख से, अच्छी भावना पैदा हो जाये उसके प्रति हमारी यह सब उनकी ही कृपा से हुआ ऐसा ही मानना चाहिये। अगर वे सिद्धान्त न बताते , हमको अपना प्यार न देते तो हमारी प्रवर्ति ही क्यों होती, कभी यह न सोचो की हमारा कमाल है, अन्यथा अहंकार पैदा होगा , अहंकार आया की दीनता गयी, दीनता गयी तो भक्ति का महल ढह गया। सारे दोष भर जाएंगे एक सेकंड में इसलिए कोई भी भगवत संबंधी कार्य हो जाये तो उसको यही समझना चाहिये कि गुरु कृपा है, उसी से हो रहा है ताकि अहंकार न होने पाये। अगर गुरु हमको न मिला होता, उसने हमको न समझाया होता ,उसने अपना प्यार दुलार न दिया होता, आत्मीयता न दी होती तो हम ईश्वर कि और प्रव्रत्त ही न होतें। अत: उन्ही की कृपा से सब अच्छे कार्य हो रहें है ऐसा सदा मान के चलो।
-----------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.
Shri Krishna said:
Just fix your mind upon Me, the Supreme Personality of Godhead, and engage all your intelligence in Me. Thus you will live in Me always, without a doubt.
It is only by attaining God that the individual soul can be blissful and overcome material afflictions. There is no other way.
------SHRI MAHARAJ JI.
तुम लोगों के अन्दर मैं ऐसा बैठ गया हूँ कि तुम लोग कितना ही प्रयत्न करो , घूम फिर कर आओगे यहीं ! फिर बेकार चिन्तन क्यों करते हो ? अगर तुम कहो कि आप अन्दर बैठे हैं किन्तु दीखते तो नहीं ? बाहरी द्रष्टि में आना बहुत छोटी चीज है किन्तु अन्दर बैठ जाना बहुत बड़ी बात है ! यह आवश्यक नहीं है कि जो माँ अपने बच्चे को बहुत प्यार करती हो और उसे बच्चा प्रतिक्षण देखता हो ।
...........जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु महाप्रभु जी।
"श्री महाराजजी के मुखारविंद से: तुम लोगो को मै कितना उठाता हूं पर तुम लोग नामापराध करके सब बराबर कर देते हो। मै तुम्हारे अपराधों को देखता हूं फिर भी तुम लोगो से कहने में डर लगता है। सोचता हू, अभी इतने चल रहे हो ,अगर कह दूँगा तो सत्संग भी छोड़ दोगे। मै माफ करना जानता हूँ,सोचता हू , कभी तो अक्ल आएगी तो ठीक हो जाओगे।"
एक भक्त की प्रभु से शिकायत कि तुम कितने निष्ठुर हो प्रभु......

नजरों में उनके हम,झूठे थे झूठे ही रहे। हमसे वो रूठे थे,रूठे ही रहे।
याद में उनकी हम,जलते व तड़पते ही रहे, अश्कवार नजरों से देखा गया न आलम कोई।
वो अपनी महफ़िल में मस्त थे मस्त ही रहे।।
सबहिं मानप्रद आपु अमानी।
सबको मान दो, स्वयं मान न चाहो,ऐसा होता है दीन।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...