Saturday, August 24, 2013

तुम लोगों के अन्दर मैं ऐसा बैठ गया हूँ कि तुम लोग कितना ही प्रयत्न करो , घूम फिर कर आओगे यहीं ! फिर बेकार चिन्तन क्यों करते हो ? अगर तुम कहो कि आप अन्दर बैठे हैं किन्तु दीखते तो नहीं ? बाहरी द्रष्टि में आना बहुत छोटी चीज है किन्तु अन्दर बैठ जाना बहुत बड़ी बात है ! यह आवश्यक नहीं है कि जो माँ अपने बच्चे को बहुत प्यार करती हो और उसे बच्चा प्रतिक्षण देखता हो ।
...........जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु महाप्रभु जी।

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मन का अटैचमेंट किसमें करें?

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