Saturday, March 15, 2014

कुसंग से बचने का एक ही रास्ता है, सदा हरि-गुरु को अपने हृदय में, अपने साथ ही महसूस करो।
--------श्री महाराज जी।
जो समझा दे श्रुति सार, उर भरा प्रेम रिझवार।
सोई है सद्गुरु सरकार, गुरु सोइ 'कृपालु' सरकार।।
क्रोध सबसे बड़ा दुश्मन है ।
...श्री महाराज जी।
करोड़ों कल्प चौरासी लाख में घूमना पड़ेगा। अनन्त जन्म घूम चुके , आगे भी घूमना पड़ेगा। हमारी जिद्द नहीं काम देगी। ए जी ---हम झगड़े में नहीं पड़ते। जो मन में आता है वो करते हैं। ठीक है।।
जीव कर्म करने में स्वतन्त्र है। मन में आये सो करते जाओ लेकिन फल भोगने में परतंत्र है। फल भोगना पड़ेगा , भगवान् के अनुशासन के अनुसार। वहाँ नहीं चलेगी।
हम नहीं भोगते जी ......... न --जो जस करइ सो तस फल चाखा।
इसलिए सावधान होकर उधार न कर के हम लोगों को साधना में तत्पर हो करके अपने लक्ष्य को प्राप्त करना चाहिए।

-----जगद्गुरु श्री कृपालु महाप्रभु जी।
कोई महापुरुष हो , चाहे राक्षस हो। अपने मन में दूसरे के प्रति हमेशा अच्छी भावना होनी चाहिये। जिससे अच्छे विचार अंतःकरण में आवें। वो जो है, वो तो रहेगा ही। वो राक्षस होगा, तो राक्षस रहेगा। महापुरुष होगा तो महापुरुष रहेगा। हम अपने अंदर अगर दुर्भावना लाते हैं तो हमने तो अपना अंतःकरण बिगाड़ लिया। अब भगवान् जो थोड़ा पैर रखे आने के लिए एबाउट टर्न चल दिये। वो कहते हैं - क्योंकि तुम तो औरों को बुलाते हो , इसलिये मैं नहीं रहता ऐसे घर में।
!! जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज !!

Friday, March 14, 2014

"हे! कृपामयी राधे.....
मेरे ऊपर भी तो कृपा करो, मुझ पर कृपा करने से तुम्हारे कृपा के भंडार मे कोई कमी नहीं आएगी अपितु तुम्हारे यश का ही विस्तार होगा।
हे! राधे, तुम्हारा तन, मन, प्राण सब कृपा द्वारा ही निर्मित है।
तुम तो कृपा का ही एक दूसरा स्वरूप हो।
राधे ! कृपा करने के अतिरिक्त अन्य कोई कार्य तुम नहीं कर सकती कृपा किए बिना तुमसे रहा भी नहीं जाता, जिस प्रकार संसार मे मछ्ली जल से ही जीवित रहती है उसी प्रकार कृपा ही तुम्हारा जीवन है अर्थात तुमने जीवन धारण ही कृपा करने के लिए किया है संसार मे सुर, नर, मुनि भी कृपा करते देखे जाते हैं परंतु वे बिना कारण के कृपा नहीं कर सकते।

.......जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
सहनशील बनो तथा कभी भी किसी बात को फील (feel) न करो ! सदा अपने अन्दर झाँको ! दूसरा चाहे कुछ भी करे ! तुम्हें तो बस अपने से ही मतलब रखना चाहिए ! यदि कोई कमायेगा तो भी अपने लिए , गँवायेगा तो भी अपने लिये।
-------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...