Friday, April 11, 2014

आत्मा का कमाने का मामला सोचो। तुम आत्मा हो , शरीर नहीं हो। शरीर को तो छोड़ना पड़ेगा , जबरदस्ती छुड़वाया जायगा शरीर। इसलिये हर साल आत्म-निरिक्षण करो और फील करो, और अगले साल की तैयारी करो कि अब की साल काम बना लेना है। क्या पता पूरा साल न मिले। छः महीने ही मिलें। एक ही महीना मिले।
क्षणभंगुर जीवन की कलिका ,
कल प्रात को जाने खिली न खिली।

------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु।

संसार से वैराग्य इसलिये नहीं है कि हमें तत्व ज्ञान नहीं हैं अतः तत्वज्ञान के सिद्धान्त को सदा ही रवाइज़ { REVISE } करते रहना चाहिये।
-------श्री कृपालु जी महाप्रभु।

हजारों जन्म के निरन्तर साधना के बाद तो यह अवस्था आती है जो आप लोगों को आज मिली है।
हजारों मील से यहां आये है , जमीन पर सोते हैं और इतना परिश्रम करते हैं।
यह सौभाग्य हजारों जन्मों के प्रयत्न के बाद मिलता है।
लेकिन आप साधारणरूप से यही समझते होंगे कि दो साल पहले {महाराजजी} मिले होते और उनका लैक्चर { LECTURE } सुना और उसके बाद ये सौभाग्य मिल गया।
यह ठीक है की { महाराजजी } के कारन गाड़ी आगे चली , लेकिन यह बर्तन तो आपके संस्कारों का ही बना हुआ था जिसमें { महाराजजी } के विषय में अधिकार मिला।

………जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु।

जब अनंत जीवों को वो अपना चुकें हैं फिर शंका कैसी ?
फिर मेरी बात का भी तो विश्वाश करना चाहिये। सच कह रहा हूँ कि बिल्कुल तुम्हारे पास खड़े होकर मुस्कराते हुए तुम्हारे प्यार को सदा देखते हैं। बताओ वह जीव कितना बड़ा भाग्यवान है जिसको श्यामसुन्दर सदा देखें।

------श्री कृपालु जी महाप्रभु।

साधना में बाधक तत्व.......... परदोष दर्शन।
परदोष - चिंतन करना ही स्वयं के सदोष होने का पक्का प्रमाण है।
दूसरों में दोष देखने से दो हानि होती हैं। एक तो वो दोष मन में आयेगा और हमारे मन को गन्दा करेगा। नंबर दो दूसरे में दोष देखने से अपने में अहंकार आयेगा। ऐसे ही अहंकार कम है क्या ?
ये अहंकार ही तो हमें चौरासी लाख योनियों में घुमा रहा है।

------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

जैसे लोभी धन कमाने के विषय में सोचता है,एसे ही भक्त भगवान का चिन्तन और प्रेम बढाने के विषय में सोचता है।
------श्री महाराज जी।

Thursday, April 10, 2014

ऊधो !, जाय कह्यो तुम वाय |
इक इक द्वै ह्वै जात जान सब, पै द्वै ह्वै इक आय |
जग प्रसिद्ध यह चोर चोर दोउ, मौसियाउतहिं भाय |
जस वे माधव तस तुम ऊधव, अंतर कछु न जनाय |
उनने उर विरहाग लगाई, तुम लै घृत छिरकाय |
मोहिं ‘कृपालु’ नहिं कहन सुनन वे, करैं जोइ मनभाय ||

भावार्थ – ब्रजांगनाएँ उद्धव के द्वारा श्यामसुन्दर को संदेश भेजती हुई कहती हैं कि हे उद्धव ! तुम उनसे जाकर कह देना कि यह तो सभी जानते हैं कि एक – एक मिलकर दो हो जाता है किन्तु यहाँ पर दो मिलकर एक होकर आये हैं अर्थात् तुम दोनों एक ही समान हो संसार में यह कहावत प्रसिद्ध है कि चोर – चोर मौसियावत भाई होते हैं | हे उद्धव ! जैसे माधव हैं वैसे तुम भी हो | तुम दोनों में कोई अंतर नहीं उन्होंने हृदय में विरह की आग लगा दी और तुम उसके ऊपर घी का छिड़काव करने आये हो | ‘श्री कृपालु जी’ के शब्दों में मुझे कुछ कहना सुनना नहीं है | उन्हें जो अच्छा लगे वही करें |
( प्रेम रस मदिरा विरह - माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति.

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...