Saturday, April 12, 2014

We may say, "O Lord, I offer you this...and this...and this..." But when we say, "I offer you my will," we have nothing else to offer.

क्रोध आवे भी तो भीतर ही रहने दो ! बाहर न आने पावे ये अभ्यास कर लो ! फिर उसके बाद भीतर भी न आने पावे ये अभ्यास कर लो ! एक साहब अपने सर्वेन्ट को डाँटता है कि देर से आया बेवकूफ , गधा और वो कहता है यस सर , यस सर ! भीतर गुस्सा है , बाहर यस सर क्योंकि अगर वो भी कह दे कि गधे ! तुम भी तो देर से आते हो ऑफिस ! भीतर से ऐसे ही कह रहा है लेकिन बाहर से कन्ट्रोल किये हुये है ! कटु वाक्य न बोलो , किसी के अपमान करने पर बाहर से उसका प्रतिवाद न करो और फिर भीतर से निकालो ! सब फैक्ट है ! मान लो तुम ऐसे हो !
~~~~जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज !

सत्संग हो या कुसंग , मनुष्य जैसा संग करता है वैसा बन जाता है।
.........श्री महाराज जी।

जब तक तुम्हें श्यामा श्याम नहीं मिल जाते उनसे मिलने की निरन्तर व्याकुलता बढ़ाते जाओ।
......श्री महाराज जी।

श्री गुरु चरण शरण गहुँ , भजु श्री युगल किशोर !
तब ' कृपालु ' हरि कृपा ते , मिलई प्रेम चितचोर !!

बिना महापुरुष की शरणागति के और बिना महापुरुष की कृपा के भगवत्प्राप्ति असंभव है।
.........जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु जी महाप्रभु।

बलि जाऊँ सलोने श्याम की।
Bali jaaun salone shyam ki.


The poet says ''I sacrifice myself on captivatingly beautiful, Blue - complexioned baby krishna.
.......SHRI MAHARAJ JI.

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...