This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Sunday, April 20, 2014
संसार
सम्बन्धी तन-मन-धन कम से कम 'उपयोग' करो, 'उपभोग' नहीं | जितने में काम चल
जाये बस उतना, उससे अधिक नहीं । जितने में पेट भर जाये- दो रोटी, चार रोटी
से, बस तुम उतने के हकदार हो हमारी सृष्टि से । भगवान कह रहे हैं | इससे
अधिक इकट्ठा किया,कब्जा किया तो मरो, फिर हम बतायेंगे कि क्या होगा
तुम्हारा । 'सस्तेनो दण्डमहरति' उसको दण्ड मिलेगा मरने के बाद और सामान भी
यहीं रखा जायेगा । तो उसने कमा करके बेटे को दे दिया पचास करोड़, अब बेटा
आवारा होगा, और बाप को भी नरक मिलेगा। तुमने परमार्थ कितना किया ? अपने
शरीर पर कितना खर्च किया, बाल बच्चों पर कितना किया परमार्थ में कितना किया
? हिसाब बताओ ।
------जगद्गुरू श्री कृपालु जी महाराज।
------जगद्गुरू श्री कृपालु जी महाराज।
भगवान
तुमकों नहीं भूलते। वो तुम्हारे हृदय में बैठे हैं, सदा सर्वत्र। वो
तुम्हारा साथ नहीं छोड़ते कभी भी। तुम ही भूले हुए हो अपने वास्तविक संबंधी
को। भगवान कहते हैं:- बस मेरा स्मरण करो, और कुछ न करो। मैं सबकुछ करूँगा
तुम्हारा। तुम खाली स्मरण करो, बाकी सब काम में करूँगा, और सदा के लिए अपना
बना लूँगा।
------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु।
------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु।
Love
does not develop in a heart, which is impure. The heart has to be
purified by sadhana. The best sadhana is weeping in separation. The
tears that flow in remembrance of Radha and Krishna wash away all sins
and offences (aparadhas), and the fire of separation that burns in the
heart consumes the wild growth of all sorts of worldly desires.
.......SHRI MAHARAJ JI.
.......SHRI MAHARAJ JI.
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