Sunday, April 20, 2014

कुसंग के गलत वातावरण में रहते हुए भी जो सत्संग में निरंतर बढ़ता जाये,वही असली साधक है।
...........श्री महाराज जी।

संसार सम्बन्धी तन-मन-धन कम से कम 'उपयोग' करो, 'उपभोग' नहीं | जितने में काम चल जाये बस उतना, उससे अधिक नहीं । जितने में पेट भर जाये- दो रोटी, चार रोटी से, बस तुम उतने के हकदार हो हमारी सृष्टि से । भगवान कह रहे हैं | इससे अधिक इकट्ठा किया,कब्जा किया तो मरो, फिर हम बतायेंगे कि क्या होगा तुम्हारा । 'सस्तेनो दण्डमहरति' उसको दण्ड मिलेगा मरने के बाद और सामान भी यहीं रखा जायेगा । तो उसने कमा करके बेटे को दे दिया पचास करोड़, अब बेटा आवारा होगा, और बाप को भी नरक मिलेगा। तुमने परमार्थ कितना किया ? अपने शरीर पर कितना खर्च किया, बाल बच्चों पर कितना किया परमार्थ में कितना किया ? हिसाब बताओ ।
------जगद्गुरू श्री कृपालु जी महाराज।

"तू प्रेम रूप रस सार। तेरा अंधाधुंध दरबार।।
तू तो करुणा की अवतार। तू है कृपा रूप साकार।।"

भगवान तुमकों नहीं भूलते। वो तुम्हारे हृदय में बैठे हैं, सदा सर्वत्र। वो तुम्हारा साथ नहीं छोड़ते कभी भी। तुम ही भूले हुए हो अपने वास्तविक संबंधी को। भगवान कहते हैं:- बस मेरा स्मरण करो, और कुछ न करो। मैं सबकुछ करूँगा तुम्हारा। तुम खाली स्मरण करो, बाकी सब काम में करूँगा, और सदा के लिए अपना बना लूँगा।
------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु।

भक्त उसे कहते हैं जो हर पल हरि-गुरु को याद करता है, और हरि-गुरु भी हर पल उसे याद करते हैं।
-----श्री महाराज जी।

बड़ी सीधी सी बात है...भगवान को जानना होगा, पाना होगा... और कोई गति नहीं और कोई दूसरा मार्ग ही नहीं है ।
.......श्री महाराज जी।

Love does not develop in a heart, which is impure. The heart has to be purified by sadhana. The best sadhana is weeping in separation. The tears that flow in remembrance of Radha and Krishna wash away all sins and offences (aparadhas), and the fire of separation that burns in the heart consumes the wild growth of all sorts of worldly desires.
.......SHRI MAHARAJ JI.

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...