Sunday, April 20, 2014

Discipline is very important in life to progress in the world as well as spiritually. Make it a discipline to do Sadhana (Devotion) on a regular basis as part of your daily routine. Do not procrastinate, you cannot get your life back and the time that is lost. Build your spiritual treasure.

Once we understand that it is in our self-interest to get happiness by seeking God and not the world, we will be able to remove the expectation of happiness from the world and focus on our devotional practice to reach Shree Krishna.
--------- SHRI MAHARAJJI.

प्यारी बनि गयी कुंजबिहारी......कुंजबिहारी बनि गये प्यारी।
......श्री महाराजजी।

कालि से भजूँगा जनि गोविंद राधे ।
कहु जाने काल कब टिकट कटा दे ॥

''अरे मनुष्यों ! कल से भजूँगा, कल से भजूँगा मत कहो, मत सोचो । क्यों...? अरे वह जो तुम्हारी खोपड़ी पर सवार है काल, यमराज । क्या पता कल के पहले ही टिकट कट जाये रात ही को ।" ऐसे रोज उदाहरण हमारे विश्व मे हो रहे हैं, कि रात को एक आदमी सोया और सदा को सो गया । न दर्द हुआ, न चिल्लाया, न घर वालों को मालूम हुआ। घर वाले समझ रहे हैं सो रहा है,
आज बड़ी देर तक सोता रहा, अरे भई जगा दो । जगाने गये तो मालूम हुआ सदा को सो गया, इसका टिकट कट गया ।
इसलिये कल से भजूँगा यह मत कहो, मत सोचो, तुरंत करो उधार मत करो । उधार करने की आदत हमारी तमाम जन्मों से है और इसलिये हम अनादिकाल से अब तक चौरासी लाख में घूम रहें है एक कारण |अन्नत संत मिले समझाया हम समझे लेकिन उधार कर दिया । करेंगे... करेंगे । तन मन धन ये तीन का उपयोग करना था तीनों के लिये हमने उधार कर दिया । करेंगे, बुढ़ापे में कर लेंगे अभी इतनी जल्दी भी क्या है । मन तो और बिगड़ा हुआ है । धन से तो इतना प्यार है कि कोई भी परमार्थ काम में खर्च करने में भी बुद्धि लगाते हैं - ''करें, कि न करें? कर दो भगवान के निमित । अरे रहने दो... अरे नहीं कर दो, अरे नहीं क्यों निकालो जेब से, अरे चलो अब कर ही देते हैं । नहीं अब कल करेंगे,'' ये हम लोगों का हाल है सोचियेगा अकेले में । यही सब होता है । तो उधार करना बन्द करना है ।

--------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

कुसंग के गलत वातावरण में रहते हुए भी जो सत्संग में निरंतर बढ़ता जाये,वही असली साधक है।
...........श्री महाराज जी।

संसार सम्बन्धी तन-मन-धन कम से कम 'उपयोग' करो, 'उपभोग' नहीं | जितने में काम चल जाये बस उतना, उससे अधिक नहीं । जितने में पेट भर जाये- दो रोटी, चार रोटी से, बस तुम उतने के हकदार हो हमारी सृष्टि से । भगवान कह रहे हैं | इससे अधिक इकट्ठा किया,कब्जा किया तो मरो, फिर हम बतायेंगे कि क्या होगा तुम्हारा । 'सस्तेनो दण्डमहरति' उसको दण्ड मिलेगा मरने के बाद और सामान भी यहीं रखा जायेगा । तो उसने कमा करके बेटे को दे दिया पचास करोड़, अब बेटा आवारा होगा, और बाप को भी नरक मिलेगा। तुमने परमार्थ कितना किया ? अपने शरीर पर कितना खर्च किया, बाल बच्चों पर कितना किया परमार्थ में कितना किया ? हिसाब बताओ ।
------जगद्गुरू श्री कृपालु जी महाराज।

"तू प्रेम रूप रस सार। तेरा अंधाधुंध दरबार।।
तू तो करुणा की अवतार। तू है कृपा रूप साकार।।"

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...