Friday, April 25, 2014

जिस प्रकार जल जाने के पश्चात् भी रस्सी अपने रस्सी रूप में ही संसार में दिखाई देती है। इसी प्रकार से संसार को हरि हरिजन के शुभ व् अशुभ कर्म ही दिखाई देते हैं उनका निर्विकार स्वरूप नहीं दीखता। उसे तो कोई महापुरुष ही देख सकता है। साधक को सदैव यह विचार करना चाहिये कि मायाबद्ध अवस्था में निरंतर अपनी मन - बुद्धि का योग हरि गुरु की बुद्धि से करने में ही कल्याण है।
............जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

संसार में न सुख है न दुख है,हमारी मान्यता से ही सुख या दुख मिलता है।
-----श्री महाराज जी।

Avoid spiritual discussions with an unqualified person. In his present state, he cannot comprehend those incomprehensible subjects as he is devoid of spiritual experience. He will only transgress, losing whatever little faith he has. In addition, his faithlessness will disturb the mind of the person revealing those divine secrets.
-------SHRI MAHARAJ JI.

प्रश्न -भगवान् की प्राप्ति कैसे हो सकती है ?
उत्तर - यह तो समस्त शास्त्र -वेदों का सिद्धान्त है कि भगवान् श्रीकृष्ण की प्राप्ति केवल भक्ति से ही हो सकती है ।
------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

Thursday, April 24, 2014

कृपा करु बरसाने वारी,तेरी कृपा का भरोसा भारी।
कोउ हो या न हो अधिकारी, सब पर कृपा करें प्यारी।।
----श्री महाराज जी।

अपनी भावना के अनुसार ही हम भगवान और संत को देखते हैं और उसी भावना के अनुसार फल मिलता है। एक भगवतप्राप्ति कर लेता है और एक नामापराध कमा के लौट आता है। और पाप कमा लेता है भगवान के पास जाकर, संत के पास जाकर 'ये तो ऐसा लगता है, मेरा ख्याल है कि'.......ये अपना ख्याल लगाता है वहाँ। अरे पहले दो-दो पैसे के स्वार्थ साधने वाले, झूठ बोलने वाले, अपने माँ, बाप ,बीबी को तो समझ नहीं सके तुम और संत और भगवान को समझने..... जा रहे हो। कहाँ जा रहे हो। हैसियत क्या है तुम्हारी, बुद्धि तो मायिक है। एक ए,बी,सी,डी.......पढ़ने वाला बच्चा प्रोफेसर की परीक्षा ले रहा है कि में देखूंगा प्रोफेसर कितना काबिल है। अरे क्या देखेगा तू तो ए,बी,सी........भी नहीं जानता। अपनी नॉलेज को पहले देख। अपनी योग्यता को पहले देख। तो इसलिए जिसकी जैसी भावना होती है वैसा ही फल अवतार काल में भी मिलता है अधिक नहीं मिलता।
--------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।

Wednesday, April 23, 2014

संसार के लोगों को एक बहुत बड़ी भ्रान्ति है। वो यह कि लोग हमारे अनुकूल हैं, हमसे प्रेम करते हैं। लेकिन मैं चैलेंज के साथ कह सकता हूँ की विश्व की एक भी स्त्री अपने पति के सुख के लिए उससे प्यार नहीं कर सकती। विश्व का कोई भी पति अपनी स्त्री के लिए प्यार नहीं कर सकता। भावार्थ यह की जब स्त्री पति ही एक दूसरे के लिए प्यार नहीं करते तो और लोग क्या करेंगे। सब एक दूसरे को धोखा दे रहे हैं,और ये नहीं समझते कि जैसे हम इसको धोखे में रखे हैं,ऐसे ही सामने वाला भी हमसे धोखा कर रहा है।
आप लोग कहेंगे की हमारी स्त्री तो हमसे बड़ा प्यार करती है। बस यही तो धोखा है आप लोगों को,जब तक जीव अपना वास्तविक आनंद प्राप्त न कर लेगा, यह असंभव है कि कोई किसी के सुख के लिए लिए कुछ करे।अरे करना तो दूर सोच तक नहीं सकता,संसार का सब प्यार स्वार्थ आधारित है। स्वार्थ कम,प्यार कम,स्वार्थ अधिक प्यार अधिक,और स्वार्थ हानि ज्यादा हो तो गोली मार देता है बेटा माँ को,स्त्री पति को........!

.........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...