This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Friday, April 25, 2014
जिस
प्रकार जल जाने के पश्चात् भी रस्सी अपने रस्सी रूप में ही संसार में
दिखाई देती है। इसी प्रकार से संसार को हरि हरिजन के शुभ व् अशुभ कर्म ही
दिखाई देते हैं उनका निर्विकार स्वरूप नहीं दीखता। उसे तो कोई महापुरुष ही
देख सकता है। साधक को सदैव यह विचार करना चाहिये कि मायाबद्ध अवस्था में
निरंतर अपनी मन - बुद्धि का योग हरि गुरु की बुद्धि से करने में ही कल्याण
है।
............जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
............जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
Avoid
spiritual discussions with an unqualified person. In his present state,
he cannot comprehend those incomprehensible subjects as he is devoid of
spiritual experience. He will only transgress, losing whatever little
faith he has. In addition, his faithlessness will disturb the mind of
the person revealing those divine secrets.
-------SHRI MAHARAJ JI.
-------SHRI MAHARAJ JI.
Thursday, April 24, 2014
अपनी
भावना के अनुसार ही हम भगवान और संत को देखते हैं और उसी भावना के अनुसार
फल मिलता है। एक भगवतप्राप्ति कर लेता है और एक नामापराध कमा के लौट आता
है। और पाप कमा लेता है भगवान के पास जाकर, संत के पास जाकर 'ये तो ऐसा
लगता है, मेरा ख्याल है कि'.......ये अपना ख्याल लगाता है वहाँ। अरे पहले
दो-दो पैसे के स्वार्थ साधने वाले, झूठ बोलने वाले, अपने माँ, बाप ,बीबी को
तो समझ नहीं सके तुम और संत और भगवान को समझने..... जा रहे हो। कहाँ जा
रहे हो। हैसियत क्या है तुम्हारी, बुद्धि तो मायिक है। एक
ए,बी,सी,डी.......पढ़ने वाला बच्चा प्रोफेसर की परीक्षा ले रहा है कि में
देखूंगा प्रोफेसर कितना काबिल है। अरे क्या देखेगा तू तो ए,बी,सी........भी
नहीं जानता। अपनी नॉलेज को पहले देख। अपनी योग्यता को पहले देख। तो इसलिए
जिसकी जैसी भावना होती है वैसा ही फल अवतार काल में भी मिलता है अधिक नहीं
मिलता।
--------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।
--------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।
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