Monday, April 28, 2014

मानव देह की क्षणभंगुरता पर विचार करते हुए तुरंत वास्तविक महापुरुष द्वारा निर्दिष्ट साधना प्रारम्भ करो, संसारी कमाई पर नहीं, ईश्वरीय कमाई पर ध्यान दो। वो ही साथ जायेगी।
.......श्री महाराज जी।

Saturday, April 26, 2014

साधकों को सावधान करते हुये कहा गया है ; भगवान् एवं भगवज्जन के कार्य लीला मात्र हैं। लीला रसास्वादन हेतु होता है। बुद्धि का प्रयोग लीला में वर्जित है। भगवान् के सभी नाम , रूप , लीला , गुण , धाम व जन दिव्य हैं। यानी सांसारिक बुद्धि का प्रयोग करने से जीव भ्रम में पड़ जायगा। ' संशयात्मा विनश्यति ' रामावतार में सीता को खोजते हुये , अज्ञता का अभिनय करते हुये श्रीराम को देखकर सती को भ्रम हो गया। वे उन्हें साधारण राजकुमार समझ कर परीक्षा ले बैठीं। परिणाम स्वरूप भगवान् शिव ने उसका परित्याग कर दिया। पुनः पार्वती के रूप में भगवान् शिव के मुख से श्रद्धा पूर्वक रामचरित्र सुना। सती द्वारा संशय किये जाने से संसार को रामचरित्र प्राप्त हुआ। सती ने स्वयं शंका कर संसार को यह दिखाया कि भगवत्लीला में संशय नहीं करना चाहिये।
------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु।
Whether it is material know-how or spiritual knowledge, it is essential to trust the instructor in order to learn. Even in school, the student who doubts the teacher cannot progress on the path of education. The instruction given by the teacher must be accepted. So it is with the divine instructor. His answers have to be trusted; his judgment has to be accepted.
------JAGADGURU SHRI KRIPALU JI MAHARAJ.

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तू तो कृपा- रूप साकार ....................... बलिहार - बलिहार !
तू तो रसिकन को सरदार ..................... बलिहार - बलिहार !
जय हो, जय हो सद्गुरु सरकार ............. बलिहार - बलिहार !!

Friday, April 25, 2014

When you start practicing 'remembrance' and 'chanting meditation' according to the instructions of Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj,your heart begins to open up and surge of divine love energy permeates your whole being,bringing contentment,confidence and security in your life.
RADHEY-RADHEY.

जिस प्रकार जल जाने के पश्चात् भी रस्सी अपने रस्सी रूप में ही संसार में दिखाई देती है। इसी प्रकार से संसार को हरि हरिजन के शुभ व् अशुभ कर्म ही दिखाई देते हैं उनका निर्विकार स्वरूप नहीं दीखता। उसे तो कोई महापुरुष ही देख सकता है। साधक को सदैव यह विचार करना चाहिये कि मायाबद्ध अवस्था में निरंतर अपनी मन - बुद्धि का योग हरि गुरु की बुद्धि से करने में ही कल्याण है।
............जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

संसार में न सुख है न दुख है,हमारी मान्यता से ही सुख या दुख मिलता है।
-----श्री महाराज जी।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...