Thursday, May 1, 2014

साधक : महाराज जी, आप हमें पहले क्यों नहीं मिलें?
श्री महाराज जी : अभी मिल गए हैं यह क्या कम है? अरबों को तो हम मिलें ही नहीं। मरने से पहले मिल गए हैं यह भगवान् की बहुत बड़ी कृपा है ।
साधक : तो महाराज जी, इस बार जब हम मर जायेंगे तो हमें आप फिर से मिलेंगे?
श्री महाराज जी : और कहाँ जाएगी! जिसका जिससे प्यार होता है वहीं तो जाता है।

अभ्यासेन तू कौन्तेय वैराग्यण च गृह्यते........
अभ्यास और वैराग्य ---- इन दो साधनों से मन शुद्ध होगा। वैराग्य माने? संसार से हटाओ..... अभ्यास माने भगवान् में लगाओ। हर समय लगाने का अभ्यास। आधा घंटा , एक घंटा जो करते हो तुम, करो, ठीक है लेकिन उसके बाद कहीं भी हो, दूकान पर बैठे हो, आफिस में काम कर रहे हो, सदा यह फीलिंग रहे, भगवान् हमारे अन्तः करण में बैठे हैं और हमारे वर्क को नोट कर रहे हैं। उसको बार बार सोचो और अभ्यास करो। अगर यह अभ्यास हो जाये तो भगवतप्राप्ति में कुछ नहीं करना धरना।
------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

Monday, April 28, 2014

आवृत्ति रसकृदुपदेशात...................
बार-बार सुनो,बार-बार सुनो, तब तत्त्वज्ञान परिपक्व होगा। ये जो हम लोगों को भ्रम होता है कि यह तो मैंने बहुत सुना है, ये तो मैं जानता हूँ। यह बहुत बड़ी भूल है। बार-बार सुनो। इससे दो लाभ हैं। बार-बार सुनने से तत्त्वज्ञान परिपक्व होगा ही दूसरे जिस समय हम उपदेश सुनते हैं, उस समय हमारी चित्तवृत्ति जिस प्रकार की होती है, उसी प्रकार से हम उपदेश ग्रहण करते हैं। अगर उस समय हमारी श्रद्धा 50 प्रतिशत है तो 50 प्रतिशत लाभ होगा, 60 है तो 60, यदि श्रद्धा 80 प्रतिशत है तो 80 प्रतिशत लाभ होगा और श्रद्धा अगर सेंट-परसेंट(cent-percent) है तो उसी समय ही हमारा काम बन जायेगा।
-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।

मानव देह की क्षणभंगुरता पर विचार करते हुए तुरंत वास्तविक महापुरुष द्वारा निर्दिष्ट साधना प्रारम्भ करो, संसारी कमाई पर नहीं, ईश्वरीय कमाई पर ध्यान दो। वो ही साथ जायेगी।
.......श्री महाराज जी।

Saturday, April 26, 2014

साधकों को सावधान करते हुये कहा गया है ; भगवान् एवं भगवज्जन के कार्य लीला मात्र हैं। लीला रसास्वादन हेतु होता है। बुद्धि का प्रयोग लीला में वर्जित है। भगवान् के सभी नाम , रूप , लीला , गुण , धाम व जन दिव्य हैं। यानी सांसारिक बुद्धि का प्रयोग करने से जीव भ्रम में पड़ जायगा। ' संशयात्मा विनश्यति ' रामावतार में सीता को खोजते हुये , अज्ञता का अभिनय करते हुये श्रीराम को देखकर सती को भ्रम हो गया। वे उन्हें साधारण राजकुमार समझ कर परीक्षा ले बैठीं। परिणाम स्वरूप भगवान् शिव ने उसका परित्याग कर दिया। पुनः पार्वती के रूप में भगवान् शिव के मुख से श्रद्धा पूर्वक रामचरित्र सुना। सती द्वारा संशय किये जाने से संसार को रामचरित्र प्राप्त हुआ। सती ने स्वयं शंका कर संसार को यह दिखाया कि भगवत्लीला में संशय नहीं करना चाहिये।
------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु।
Whether it is material know-how or spiritual knowledge, it is essential to trust the instructor in order to learn. Even in school, the student who doubts the teacher cannot progress on the path of education. The instruction given by the teacher must be accepted. So it is with the divine instructor. His answers have to be trusted; his judgment has to be accepted.
------JAGADGURU SHRI KRIPALU JI MAHARAJ.

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तू तो कृपा- रूप साकार ....................... बलिहार - बलिहार !
तू तो रसिकन को सरदार ..................... बलिहार - बलिहार !
जय हो, जय हो सद्गुरु सरकार ............. बलिहार - बलिहार !!

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...