Thursday, May 1, 2014

अभ्यासेन तू कौन्तेय वैराग्यण च गृह्यते........
अभ्यास और वैराग्य ---- इन दो साधनों से मन शुद्ध होगा। वैराग्य माने? संसार से हटाओ..... अभ्यास माने भगवान् में लगाओ। हर समय लगाने का अभ्यास। आधा घंटा , एक घंटा जो करते हो तुम, करो, ठीक है लेकिन उसके बाद कहीं भी हो, दूकान पर बैठे हो, आफिस में काम कर रहे हो, सदा यह फीलिंग रहे, भगवान् हमारे अन्तः करण में बैठे हैं और हमारे वर्क को नोट कर रहे हैं। उसको बार बार सोचो और अभ्यास करो। अगर यह अभ्यास हो जाये तो भगवतप्राप्ति में कुछ नहीं करना धरना।
------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

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