Monday, May 5, 2014

हे विराट युग पुरूष कृपानिधि ,ज्ञान भक्ति रस के दातार।
सगुण अगुण परतत्व 'कृपालु', जीवन है तुम पर बलिहार।।
हे सर्वज्ञ सर्वसुख सागर , पतित जनन के तारनहार।
दीनबंधु हे परम हितैषी , श्रद्धा सुमन करहुँ स्वीकार।।

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मन का अटैचमेंट किसमें करें?

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