Tuesday, May 20, 2014

Without having gained true spiritual knowledge, we cannot even perform any devotional practice, let alone God-realisation! Instead, we continue to indulge in fallacious reasoning with our mind still full of doubts and apprehensions and spend our entire life in meaningless pursuits. In so doing, we allow this human body to go to waste. Any devotional practice that we perform would not benefit us because of our lack of proper or adequate understanding. We would be limited to performing the external acts of doing japa (repetition of some Deity’s name or Vedic hymns), pattha (recitation of passages from scriptures), puja (ritualistic worship) or going on pilgrimage.
-----JAGADGURU SHRI KRIPALU JI MAHARAJ.

श्री महाराजजी से प्रश्न:- महाराजजी- केवल धन की सेवा से भी लक्ष्य प्राप्ति हो सकती है। यानि गुरु की धन की सेवा की जो आज्ञा है और वो पूरी जी जान से आदमी करता रहे, तो उससे भी भगवदप्राप्ति हो सकती है केवल अगर वही आज्ञापालन कर ली जाय तो?
श्री महाराजजी द्वारा उत्तर:- नहीं। मेन बात तो शरणागति की है बिना मन की
शरणागति के तन और धन से काम नहीं चलेगा। मन की शरणागति मेन पॉइंट। उसके बाद हैं ये सब।
यानि मन का पूर्ण सरैंडर, पूर्ण शरणागति यह नंबर एक।
उसके हेल्पर हैं शरीर से सेवा, धन से सेवा और फिर एक रीज़न ये भी है कि तन की सेवा सबको नहीं मिल सकती हमेशा। धन की सेवा सब नहीं कर सकते। बहुत से हैं उनकी रोटी-दाल का ही ठिकाना नहीं है अपना, वो कैसे करेंगे? लेकिन मन की शरणागति सब कर सकते हैं, वो प्रमुख है उसके बिना काम नहीं चलेगा। इतने सारे मंदिर बनवा दिये हैं सेठ जी ने, धन से। लेकिन इससे कुछ नहीं होता। पाप से पैसा इकट्ठा करके मंदिर खड़ा कर दिया और उसमें अपना नाम लिख दिया। वह सेठ जी का मंदिर है कि भगवान का मंदिर है। ऐसे लोगो को नरक के सिवाय क्या मिलेगा। तो धन की सेवा क्या हुई? सेवा में श्रद्धा, भगवदभावना का मिक्सचर होना चाहिये और जहाँ अपनी प्रतिष्ठा का सवाल है वह सेवा कहाँ है? वह तो इनकम टैक्स से बचने का उपाय है।

Monday, May 19, 2014

"By each passing day, Our bodies are being dragged to graves but our minds are carried by illusions...........may we change.."

मेरी वफ़ाओं का मुझको सिला वो भला क्या देगा........!
मैं जानता हूँ कि अपनी मजबूरियाँ गिना देगा........!!
राधे-राधे।

साधक को किसी से द्वेष भाव नहीं रखना चाहिये ! यदि हो जाये तो बार - बार उसका चिंतन न करे ! यदि है भी तो कथन में उसके सामने प्रकट न करे ! संसार में सब स्वार्थी हैं अतः इस विषय को लेकर किसी से द्वेष होना गलत है !
.........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

श्री महाराजजी के मुखारविंद से: तुम लोगो को मै कितना उठाता हूं पर तुम लोग नामापराध करके सब बराबर कर देते हो। मै तुम्हारे अपराधों को देखता हूं फिर भी तुम लोगो से कहने में डर लगता है। सोचता हू, अभी इतने चल रहे हो ,अगर कह दूँगा तो सत्संग भी छोड़ दोगे। मै माफ करना जानता हूँ,सोचता हू , कभी तो अक्ल आएगी तो ठीक हो जाओगे।

The material mind oscillates amidst the three gunas, and so at times we experience a deep longing for God and at times we feel uninspired. However, a sadhak is one who pushes the mind and intellect to harbor a deep desire for God, even when they would rather be languid and cold. Sometimes we naturally feel inspired. Other times, when we strain to become inspired, even when we don't naturally feel so, that is sadhana.

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...