Wednesday, May 21, 2014

हम भगवान् के आगे , उनको सामने खड़ा करके, रो कर उनके दर्शन , उनका प्रेम माँगे बस यही भक्ति। रो कर अकड़ कर नहीं , जैसे कोई पानी में डूबने लगता है तो वो कितनी व्याकुलता में हाथ पैर उपर करता है , तैरना नहीं जानता है।जैसे मछली को बाहर डाल दो , कैसे तड़पती है पानी के लिये । ऐसे ही श्यामसुंदर के मिलन के लिये हमको तड़पना होगा। इस जन्म में अथवा हजार जन्म बाद फिर। और ये करना पड़ेगा।
-----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

श्री महाराजजी कहते हैं कि: जितनी क्षमा हम करते हैं ,उतना कोई नहीं कर सकता। कई बार सोचते है कि उसका परित्याग कर दिया जाये ,किन्तु फिर दया आ जाती है।
हे ! करुणा सागर, दीन बंधु, पतितपावन, तुम्हारी कृपा के बिना कोई तुम्हारी सेवा भी तो नहीं कर सकता । हमारी गति, मति, रति सर्वस्व तुम्ही हो । अकिंचन के धन, निर्बल के बल, अशरण-शरण, कहाँ से लाएँ तुम्हें प्रसन्न करने के लिए सतत रुदन और करुण क्रंदन । अनंत जन्मो का विषयानंदी मन संसार के लिए आँसू बहाना चाहता है श्याम मिलन के लिए नहीं । अकारण-करुण कुछ ऐसी कृपा कर दो की मन निरन्तर युगल चरणों का स्मरण करते हुए ब्रजरस धन का लोभी बन जाये । रोम रोम प्रियतम के दर्शन के लिए, स्पर्श के लिए, मधुर मिलन के लिए, इतना व्याकुल हो जाए की आंसुओं की झड़ी लग जाए ओर हम आँसुओ की माला पहनकर तुम्हें प्रसन्न कर सकें पश्चात निशिदिन श्यामा श्याम मिलन हित आँसू बहाते रहें । अपने अकारण करुण विरद की रक्षा करते हुए हे ! कृपालु, हे ! दयालु हमारा सर्वस्व बरबस लेकर ब्रजरस प्रदान करो । किसी भी प्रकार यह स्वप्न साकार करो की हम तुम्हारे वास्तविक गौर-श्याम मिलित स्वरूप को हृदय मे सदा सदा के लिए धारण करके प्रेम रस सागर मे निमग्न हो अश्रु पूरित नेत्रों से तुम्हारी विरुदावली का अनंत काल तक गान करते रहें ।
-----जगद्गुरुत्तम भक्तियोगरसावतार कृपालु महाप्रभु ।

दूसरे के दोष देखना और अपने आप को अच्छा कहलवाना। यही अभ्यास हो गया है हम लोगों का,यह सबसे बड़ी बाधा है ईश्वरीय शरणागति में।
...........श्री महाराज जी।

Tuesday, May 20, 2014

जिन जीवों ने 'गुरु एवं भगवान' के श्री चरणों में अपना सर्वस्व आत्मसमर्पण कर दिया बस उन्ही का जीवन 'जीवन है' और शेष सब मृतक हैं।
............श्री महाराजजी।

गुरु द्वारा दिया गया 'तत्त्वज्ञान' हमारे लिये रिवॉल्वर का काम करेगा। बड़ा भारी पहलवान आ रहा है वह हमें मार देगा। अरे! क्या मार देगा। रिवॉल्वर जेब में है तो भागेगा डर के मारे वो पहलवान। तो वो शक्ति है गुरु के उपदेश में कि संसार की बड़ी से बड़ी कठिन परिस्थिति का सामना भी आसानी से कर सकते हो। गुरु की आज्ञा का अगर हम पालन करते तो हम लापरवाही न करते। इसलिए अपने पतन में हम स्वयं कारण है, हमारी बुद्धि, हमारी लापरवाही और उत्थान में गुरु कृपा मानो ,हमारी बुद्धि से उत्थान कभी नहीं हुआ आजतक न होगा ,हमारी बुद्धि तो मायिक है ये तो ईश्वरीय बुद्धि महापुरुष ने दान दी कि ऐसा करो, ऐसा करो, ऐसा न करो, इस बुद्धि के दान के द्वारा भगवननाम लिया, भगवान के लिये आँसू बहाया जो कुछ भी अच्छी चीजें हमारे पास आई वो महापुरुष के द्वारा ही आई। उसकी कृपा से अच्छे काम हो रहें है और गलत काम इसलिए हो रहें है कि महापुरुष के आदेश को, उपदेश को छोड़ दिया और अपनी बुद्धि के बल पर आ गये तो हमारी बुद्धि तो गड़बड़ ही थी, उसने हमें गड़बड़ में डाल दिया बस अब मर गये, अब हम दोष दे रहें है महापुरुष को, भगवान को, इसलिए सदा यह ज्ञान रहना चाहिए कि अच्छे कार्य उनकी ही कृपा से हो रहें है लेकिन गलत कार्य में अपना दोष ही समझना चाहिये क्योकि हमने उनके आदेशों का उल्लंघन किया लापरवाही की और अपनी बुद्धि के बल पर हमने कार्य किया इसलिए पतन हो गया हमारा।
-------जगद्गुरुत्तम श्री कृपालुजी महाराज।

अनंत जन्मों तक माथा पच्ची करने के पश्चात भी जो दिव्य ज्ञान हमें न मिलता वह हमारे गुरु(जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज) ने इतने सरल और सहज रूप में हमें प्रदान कर दिया, अब इसके बाद हमारी ड्यूटि है कि उस तत्त्वज्ञान को बार-बार चिंतन द्वारा पक्का करके उसके अनुसार प्रैक्टिकल करें। अब हमने यहाँ लापरवाही की, एक ने कुछ परवाह की, एक ने और परवाह की, एक ने पूर्ण परवाह की, पूर्ण शरणागत हो गया, अब महापुरुष ने तो अकारण कृपा सबके ऊपर की, सबको समझाया। लेकिन उसमें एक घोर संसारी ही रहा, एक थोड़ा बहुत आगे बढ़ा, एक कुछ ज्यादा आगे बढ़ा, एक सब कुछ त्याग करके 24 घंटे लग गया लक्ष्य प्राप्ति पर। पर जो 24 घंटे लग गया लक्ष्य प्राप्ति हेतु क्या उसके ऊपर विशेष कृपा हुई, यह सोचना मूर्खता है। कृपा तो सब पर बराबर हुई लेकिन तपे लोहे पर पानी पड़ा छन्न, जल गया और कमल के पत्ते पर पड़ा तो मोती की तरह चमकने लगा और वही पानी अगर सीप में पड़ा स्वाति का तो मोती बन गया। पानी तो सब पर बराबर पड़ रहा है लेकिन जैसा पात्र है, जैसा मूल्य समझा जितना विश्वास किया जितना वैराग्य है जिसको उसका बर्तन उतना बना, उसके हिसाब से उसने उतना लाभ उठाया। तो महापुरुष की यह कृपा है तत्त्वज्ञान करवा देना। क्योंकि बिना तत्त्वज्ञान के हम साधना भी क्या करते, भगवदप्राप्ति का तो प्रश्न ही नहीं है। तर्क, कुतर्क, संशय ही करते रहते, इसी में पूरा जीवन बीत जाता, मानव देह व्यर्थ हो जाता। साधना करते भी तो अपने अल्पज्ञान या गलत ज्ञान के अनुसार ही करते जिससे कोई लाभ नहीं होता।
.......जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु जी महाप्रभु।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...