Thursday, June 5, 2014

भगवान् को तो शुद्ध मन पसंद है ! अशुद्ध मन से वो प्यार नहीं करते ! समदर्शी बने रहते हैं अर्थात उनके कर्मों का फल दे देते हैं बस ! जैसे मुन्सिफ होता है , इन्साफ करते हैं ! लेकिन गुरु पतितों से प्यार करता है !
..............जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु जी महाप्रभु की जय हो ।

एक साधक का प्रश्न :- भगवान् का चिन्तन कैसे होगा ?
श्री महाराज जी द्वारा उत्तर :- भगवान् का चिन्तन होता नहीं है , करना पड़ता है। जो कुछ होता है वह पहले का किया हुआ चिन्तन हो रहा है। संसार का चिन्तन बिना किये हो जाता है क्योंकि पहले का हमारा अभ्यास है। अब यदि भगवान् का चिन्तन करना है तो उसका अभ्यास प्रारंभ करना होगा। अभ्यास द्वारा वह भी होने लगेगा।

Wednesday, June 4, 2014

एक दिन अगर निकल जाये ऐसा कि न किसी के प्रति 'द्वेष' अंदर आने पावे , न किसी के प्रति 'राग' आने पावे , समझो वो तुम्हारा जीवन का असली दिन है ।और आ जाये कभी अभ्यास के कारण तो फील ( feel ) करो ।फीलिंग ( feeling) से दोष कम होते हैं।
--------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

आ जाओ मेरे प्यारे बच्चों ......
चिंता न करो.......
मैं हूँ न?......

बस मुझसे प्यार ही तो करना है तुम्हे....येन केन प्रकारेण.......
बाकी सब मैं देख लूँगा........
जैसे संसार मैं प्यार करते हैं ठीक वैसे ही ...
लेकिन शर्त वही रहेगी...नित्य , निष्काम , अनन्य ...
मन केवल हरि-गुरु में ही रखो बस .. काम हो जायेगा...
अभ्यास तो करना ही पड़ेगा तुम सब को ..
अनंत जन्म का गलत अभ्यास जो कर रखा है तुम सब ने इसीलिए...

"बरबस पतितन देत प्रेम रस , अस रसिकन सरताज "
हरी गुरु चिंतन साधना , साध्य प्रेम निष्काम।
दिव्य दरस की प्यास नित , बाढ़े आठों याम।।

------तुम्हारा कृपालु।

स्वयं से पूछो 'तुमने कितने घंटे साधना करने में लगाये? B.a ,M.a,M.ed करने में तो 10 गुणा समय दिया-पेट के लिए। ईश्वरीय काम के लिए कितने घंटे दिये?' और चाहते हो पूरा लाभ मिल जाये। कोई नगर तुम्हारे घर से 100 मील दूर है, तो दस मील चलने के बाद तुम खड़े क्यों हो गए? अरे और आगे चलो, नगर मिलेगा। रोड ठीक है, माइलस्टोन भी मिल रहें हैं। लेकिन अगर आपको रोड़ पर डाउट हो गया ,तो 10 मील जाकर लौट आए। फिर 10 मील दक्षिण चले, फिर 10 मील उत्तर चले, फिर पश्चिम चले, इस प्रकार जीवन भर चलते जाओ, तो कभी भी लक्ष्य तक नहीं पहुचोंगे।
25 foot गड्ढा खोदा।निराश हो गया,"अजी यहाँ पानी नहीं है", और जगह खोदो। वहाँ भी 20 foot खोदा। यहाँ भी नहीं है। इस प्रकार करोड़ों foot खोदते जाओ। पानी नहीं निकलेगा। यदि लगातार एक जगह 50 foot और खोद डालते तो पानी निकल आया होता। अगर वास्तविक महापुरुष मिल जाये, तो कुछ भी असम्भव नहीं। अनन्त नगण्य जीव महापुरुष बने हैं। तुम क्यों नहीं बन सकते?

--------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

एक - एक क्षण में लोग मर रहें हैं। यमालय की ओर जा रहे हैं। लेकिन जो लोग लाशें जलाने या फूँकने जाते हैं, वे समझते हैं - हमको थोड़े ही मरना है अभी। वह पूरे जीवन की प्लानिंग { planning } कर रहा है इससे बड़ा कोई आश्चर्य हो सकता है। मुर्खता का अंतिम स्वरूप है यह।
मनुष्यों----- तुमको मनुष्य शरीर मिल गया है, इसका लाभ उठा लो। यह करोड़ों जन्म में मिला है।
जन्मान्तर सहस्त्रैस्तुमनुष्यत्वं हि दुर्लभम।
{ महाभारत }
जल्दी अपनी काम बना लो। भगवान् के शरणापन्न हो जाओ। संत के द्वारा समझकर अपना कल्याण करो।
वेद कहता है ----
इह चेदशकद् बौद्धम प्राक शरीरस्य विस्त्रसः
ततः सर्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय कल्पते।
{ कठोपनिषद }
ऐ मनुष्यों --------ये मनुष्य शरीर पाकर ईश्वर भक्ति करके अपना लक्ष्य प्राप्त कर लो। नहीं तो 'सर्गेषु' [ करोड़ों ] बार चौरासी लाख योनियों में घूमना पड़ेगा।

--------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

यह तो संसार है इसमे सब कुछ कहने वाले लोग हैं ,सही भी,गलत भी। फिर गलत कहने वाले तो 99 परसेंट(percent) हैं, सत्वगुणी बुद्धि हुई तो सत्व गुणी बात कहने लगे, रजोगुणी बुद्धि हुई तो हमारा निर्णय रजोगुणी हो गया, तमोगुणी बुद्धि हुई तो एक दम से तमोगुण बात बोलने लगे। इसलिये जब हमारी स्वयं की बुद्धि ही एक सी नहीं रहती तो दूसरों से हम क्यों आशा करते हैं कि वह हमारी बात का समर्थन ही करेगा। ये कभी सतयुग में नहीं हुआ,त्रेतायुग में नहीं हुआ,द्वापर में नहीं हुआ,फ़िर आज क्यों होगा? सारे संतों ने इसलिए लिखा "तुम किसी की और मत देखो न किसी की सुनों बस,अपना काम करो।"
............जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...