एक साधक का प्रश्न :- भगवान् का चिन्तन कैसे होगा ?
श्री महाराज जी द्वारा उत्तर :- भगवान् का चिन्तन होता नहीं है , करना पड़ता है। जो कुछ होता है वह पहले का किया हुआ चिन्तन हो रहा है। संसार का चिन्तन बिना किये हो जाता है क्योंकि पहले का हमारा अभ्यास है। अब यदि भगवान् का चिन्तन करना है तो उसका अभ्यास प्रारंभ करना होगा। अभ्यास द्वारा वह भी होने लगेगा।
श्री महाराज जी द्वारा उत्तर :- भगवान् का चिन्तन होता नहीं है , करना पड़ता है। जो कुछ होता है वह पहले का किया हुआ चिन्तन हो रहा है। संसार का चिन्तन बिना किये हो जाता है क्योंकि पहले का हमारा अभ्यास है। अब यदि भगवान् का चिन्तन करना है तो उसका अभ्यास प्रारंभ करना होगा। अभ्यास द्वारा वह भी होने लगेगा।




![एक - एक क्षण में लोग मर रहें हैं। यमालय की ओर जा रहे हैं। लेकिन जो लोग लाशें जलाने या फूँकने जाते हैं, वे समझते हैं - हमको थोड़े ही मरना है अभी। वह पूरे जीवन की प्लानिंग { planning } कर रहा है इससे बड़ा कोई आश्चर्य हो सकता है। मुर्खता का अंतिम स्वरूप है यह।
मनुष्यों----- तुमको मनुष्य शरीर मिल गया है, इसका लाभ उठा लो। यह करोड़ों जन्म में मिला है।
जन्मान्तर सहस्त्रैस्तुमनुष्यत्वं हि दुर्लभम।
{ महाभारत }
जल्दी अपनी काम बना लो। भगवान् के शरणापन्न हो जाओ। संत के द्वारा समझकर अपना कल्याण करो।
वेद कहता है ----
इह चेदशकद् बौद्धम प्राक शरीरस्य विस्त्रसः
ततः सर्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय कल्पते।
{ कठोपनिषद }
ऐ मनुष्यों --------ये मनुष्य शरीर पाकर ईश्वर भक्ति करके अपना लक्ष्य प्राप्त कर लो। नहीं तो 'सर्गेषु' [ करोड़ों ] बार चौरासी लाख योनियों में घूमना पड़ेगा।
--------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।](https://fbcdn-sphotos-g-a.akamaihd.net/hphotos-ak-xpf1/t1.0-9/s526x296/10443421_636183436472509_5299514640625990216_n.jpg)

