Friday, June 6, 2014

ले चलो कश्ती भँवर में 'श्याम' तुम अपनी,यों किनारे डूबने को दिल नहीं करता.......!
राधे-राधे।

Unless god makes us understand, nothing can be understood.
जब तक भगवान न चाहें, हमारे लिए कुछ भी जानना संभव नहीं।
........श्री महाराजजी।

Heart (Mind) is like rusty iron. The polish for this is remembering DEATH and learning the GOD.
------SHRI MAHARAJJI.

कभी यह न सोचो कृपा की कमी है, कमी जो है वह हममें ही है | महापुरुष शरणागत के लिये क्या-क्या भगीरथ प्रयत्न करता है, यह तो भगवत्प्राप्ति होने पर ही साधक को समझ में आ सकता है | सब लोग कमरा बन्द करके सोचें तो पायेंगे कि मेरा कितना कायापलट हो गया ? मैं कहाँ जा रहा था, कहाँ से कहाँ ला कर खड़ा कर दिया महाराज जी ने ?
-----------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

Thursday, June 5, 2014

For a spiritual aspirant, the effort to avoid all forms of Kusang is even more important than the practice of devotion.
..........SHRI MAHARAJ JI.

हम भगवान् के आगे , उनको सामने खड़ा करके, रो कर उनके दर्शन , उनका प्रेम माँगे बस यही भक्ति। रो कर अकड़ कर नहीं , जैसे कोई पानी में डूबने लगता है तो वो कितनी व्याकुलता में हाथ पैर उपर करता है , तैरना नहीं जानता है।जैसे मछली को बाहर डाल दो , कैसे तड़पती है पानी के लिये । ऐसे ही श्यामसुंदर के मिलन के लिये हमको तड़पना होगा। इस जन्म में अथवा हजार जन्म बाद फिर। और ये करना पड़ेगा।
-----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

भगवान् को तो शुद्ध मन पसंद है ! अशुद्ध मन से वो प्यार नहीं करते ! समदर्शी बने रहते हैं अर्थात उनके कर्मों का फल दे देते हैं बस ! जैसे मुन्सिफ होता है , इन्साफ करते हैं ! लेकिन गुरु पतितों से प्यार करता है !
..............जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु जी महाप्रभु की जय हो ।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...