Monday, July 7, 2014

हम जो चाहते हैं उसे प्रियतम जब चाहे दें , यह निष्काम प्रेम और हम जब चाहते हैं तभी दें , यह सकाम प्रेम।
----श्री महाराज जी।


अरे मनुष्यों! ये मन इतना बड़ा दुश्मन है कि जैसे दुराचारिणी स्त्री अपने लवर (lover) से मिलकर के अपने पति का वध करा देती है, ऐसे ही ये मन विषयों से मिलकर के आत्मा का पतन करा देता है । इसको दोस्ती मत करना इससे कभी । और हम लोग - हमारा मन कर रहा है सो जाओ, हमारा मन कर रहा है आज चले जी होटल (hotel), हमारा मन कर रहा है ! हाँ हाँ । ये मन कर रहा है वो करोगे फिर तो घूमा करो चौरासी लाख में । ये भगवान् का जेल (jail) है | वहाँ दाल नहीं गलेगी, संसार में गल जाएगी । भगवान् के यहाँ नहीं गलेगी । भगवान् स्वयं देखता है, स्वयं नोट करता है, और स्वयं जजमेंट देता है, और स्वयं फल देता है । वो किसी को नहीं छोड़ता, अपने बाप को नहीं छोड़ता। दशरथ जी मर गए, राम ने नहीं जिलाया। अरे उनको जिलाने में कुछ करना पड़ता क्या ।सोचा और हो गया ।
सत्य-संकल्प हैं भगवान्। लेकिन नहीं, उनका वो समय आ गया, वो गए, हमसे मतलब नहीं हैं बाप हो, चाहे कोई हो । इसलिए मन से भगवान् की भक्ति करने का हम जो आप लोगों से request करते हैं, हज़ार लाख बार कर चुके, उसको जब तक प्रैक्टिकल नहीं करोगे तब तक अनंत कोटि जगद्गुरु मिला करे, क्या होगा ! कह देना भगवान् से कि हाँ मिले थे और बड़े-बड़े लेक्चर (lecture) सब सुने थे हम और समझे भी थे । लेकिन हमारे मन ने कहा कि 'ऐसा है कि'।इस दो अंगुल की खोपड़ी ने सर्वनाश किया हुआ है,अरे! इसको संसार में लगाओ,भगवान में नहीं।

...........जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।

स्वभाव ही है अकारण कृपा करने का | तुम विश्वास कर लो, बस, काम बन जाय
तुम अपने आपको सदा के लिए उनके हाथों बेच दो, वे सब ठीक कर देंगे |
देखो उन्होंने महान से महान पापियों को भी हृदय से लगाया है,फिर तुम्हे क्यों अविश्वास या संकोच है|
एक बार ऐसा करके तो देखो |

............तुम्हारा कृपालु।

श्री राधे हमारी सरकार, फ़िकिर मोहिं काहे की ।
हित अधम उधारन देह धरेँ, बिनु कारन दीनन नेह करेँ ;
जब ऐसी दया दरबार , फ़िकिर मोहिं काहे की ।
...........श्री महाराज जी।

Sunday, July 6, 2014

मानव देह मिला, वास्तविक गुरु मिले, संसार से प्रथक हो गये, हरि-गुरु सेवा भी मिली, इतनी कृपा तो करोड़ों जीवों में से किसी एक को भी नहीं मिलती। अत: क्षण-क्षण सावधान रहो।
--------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

Service (seva) (physical or monetary) (tan se ya dhan se) is a token of your love and dedication at your master's feet which he accepts out of his kindness.If a rasik saint accepts your services,it is only his grace upon you.
------JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ.

Practice to feel the presence of Shri Maharaj Ji everywhere and all the time.
RADHEY-RADHEY.

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...