Friday, August 1, 2014

कदम्ब की डारी झूलें राधा प्यारी , झूलें राधा प्यारी झुलावें बनवारी !
गावें ब्रजनारी दै दै कर तारी , कुंजबिहारी बोलें बलिहारी !
हौंहू वारी वारी झाँकी लखि न्यारी , बनि ब्रजनारी नाचें मदनारी !
कबहुँ मुरारी झोंटा देंय भारी , अति सुकुमारी डरपति प्यारी !

Happy Hariyali Teej to all of you !!
RADHEY-RADHEY.

If your Guru had not given you spiritual knowledge, if he had not bestowed his love upon you, how would you be inclined to do good things in this life? So do not ever give credit to yourself, as this will only give rise to ego and egotism takes away humility. Once humility is gone, the castle of bhakti will come crashing down. So if you have done some noble deeds, YOU MUST BE THANKFUL TO THE GURU, with whose grace alone you are able to do such things; this will save you from egotism.
----JAGADGURU SHRI KRIPALU JI MAHARAJ.
One should not forget God in times of happiness and should realise His grace even in times of misery.
सुख का अनुभव करते समय भी भगवान् को मत भूलो तथा दुःखकाल में भी उनकी कृपा का अनुभव करो।
-------SHRI MAHARAJ JI.

गुरु की सेवा करने वाला साधक तो गुरु का प्रिय है,अत: उससे द्वेष करना पाप है।
.......श्री महाराज जी।

Wednesday, July 23, 2014

अनंत जन्मों तक माथा पच्ची करने के पश्चात भी जो दिव्य ज्ञान हमें न मिलता वह हमारे गुरु ने इतने सरल और सहज रूप में हमें प्रदान कर दिया, अब इसके बाद हमारी ड्यूटि है कि उस तत्त्वज्ञान को बार-बार चिंतन द्वारा पक्का करके उसके अनुसार प्रैक्टिकल करें। अब हमने यहाँ लापरवाही की, एक ने कुछ परवाह की, एक ने और परवाह की, एक ने पूर्ण परवाह की, पूर्ण शरणागत हो गया, अब महापुरुष ने तो अकारण कृपा सबके ऊपर की, सबको स
मझाया। लेकिन उसमें एक घोर संसारी ही रहा, एक थोड़ा बहुत आगे बढ़ा, एक कुछ ज्यादा आगे बढ़ा, एक सब कुछ त्याग करके 24 घंटे लग गया लक्ष्य प्राप्ति पर। पर जो 24 घंटे लग गया लक्ष्य प्राप्ति हेतु क्या उसके ऊपर विशेष कृपा हुई, यह सोचना मूर्खता है। कृपा तो सब पर बराबर हुई लेकिन तपे लोहे पर पानी पड़ा छन्न, जल गया और कमल के पत्ते पर पड़ा तो मोती की तरह चमकने लगा और वही पानी अगर सीप में पड़ा स्वाति का तो मोती बन गया। पानी तो सब पर बराबर पड़ रहा है लेकिन जैसा पात्र है, जैसा मूल्य समझा जितना विश्वास किया जितना वैराग्य है जिसको उसका बर्तन उतना बना, उसके हिसाब से उसने उतना लाभ उठाया। तो महापुरुष की यह कृपा है तत्त्वज्ञान करवा देना। क्योंकि बिना तत्त्वज्ञान के हम साधना भी क्या करते, भगवदप्राप्ति का तो प्रश्न ही नहीं है। तर्क, कुतर्क, संशय ही करते रहते, इसी में पूरा जीवन बीत जाता, मानव देह व्यर्थ हो जाता। साधना करते भी तो अपने अल्पज्ञान या गलत ज्ञान के अनुसार ही करते जिससे कोई लाभ नहीं होता।

--------जगद्गुरुत्तम श्री कृपालुजी महाप्रभु।

विनम्र निवेदन........
प्रिय साधक समुदाय।
श्री महाराज जी के चरणों में प्रणाम करते हुये गुरुपूर्णिमा के पावन पर्व पर आप सभी को हार्दिक बधाई दे रही हूँ।
भक्ति - धाम में आप सभी का हार्दिक अभिनन्दन है। यह श्री महाराजजी की जन्मस्थली आप सभी को श्री महाराजजी का दिव्य सन्देश दे रही है। यहाँ का कण कण दिव्य चिन्मय है जो भक्ति का अनुपम स्रोत है क्योंकि यहाँ श्री महाराजजी ने अहनिर्श श्यामा-श्याम गुण - गान कराया है।
अखण्ड संकीर्तन , करुण क्रन्दन युक्त साधना यही यहाँ का इतिहास है। यहाँ रहकर गुरु सेवार्थ जीवन समर्पित करने वाले तो धन्य हैं ही किन्तु आप सब भी परम सौभाग्यशाली हैं जो गुरुधाम में साधना करने के लिये समय समय पर आतें हैं। और श्री महाराजजी की सहर्ष सेवा करते हैं।

जे.के.पी. द्वारा जितने भी जनहित कार्य किये जा रहे हैं वह श्री महाराजजी की कृपा से अत्यधिक सुचार रूप से चल रहे हैं। वे स्वयं ही योगक्षेम वहन कर रहे हैं , किन्तु आप सभी से मैं आशा करती हूँ कि आप सभी सदैव श्री महाराजजी के कार्यों को आगे बढ़ाने में पूर्ण सहयोग करेंगे। उनके दिव्य संदेशों को , उनकी दिव्य वाणी को , उनके साहित्य को हमें जन -जन तक पहुँचाना है।
शुभकामनायों सहित
तुम्हरी बड़ी दीदी.

अरी मैं, मरी हरी बिनु हाय |
विरह न रहन देत अब प्रानन, कोउ बचावहु धाय |
बिनुहिं अनल हौं जरी जात हौं, रहे नैन झरि लाय |
कहा करूँ ? कित जाऊँ ? एक छिन, उन बिनु रह्यो न जाय |
तुम प्राणन – ईश्वर प्राणेश्वर !, पुनि कत बेर लगाय |
अब ‘कृपालु’ पिय बेगि मिलहु न तु, हौं ही मिलिहौं आय ||

भावार्थ – एक विरहिणी कहती है कि अरी दैया ! प्यारे श्यामसुन्दर के बिना मेरा तो प्राण निकला जा रहा है | विरह अब प्राणों को लेकर ही मानेगा | हाय ! हाय !! कोई तो दौड़ कर मुझे बचाओ | बिना आग के ही मै जली जा रही हूँ एवं उससे बचने के लिये आँखों से आँसू की वर्षा भी कर रही हूँ ? हाय ! मैं क्या करूँ ? कहाँ चली जाऊँ मुझसे श्यामसुन्दर के बिना तो एक क्षण भी रहा नहीं जाता | हे प्राणेश्वर ! तुम मेरे प्राणों के स्वामी होते हुए भी इतनी देर क्यों लगा रहे हो ? ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि अब शीघ्र ही दर्शन दे दो, नहीं तो प्राण निकल जाने पर मैं स्वयं ही आकर मिल जाऊँगी |
( प्रेम रस मदिरा विरह - माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...