Tuesday, August 5, 2014

साधक ने अपनी बुद्धि को जब महापुरुष एवं भगवान् के ही हाथ बेचा है, तब उसे अपनी बुद्धि को महापुरुष के आदेश से ही सम्बद्ध रखना चाहिये | लोक में भी देखो, एक कूपमण्डूक अत्यन्त मूर्ख ग्रामीण भी अपने मुकदमे में किसी व्युत्पन्न वकील के द्वारा प्रमुख कानूनी विषयों को अपनी बुद्धि में रखकर धुरन्धर वकील की जिरह में भी नहीं उखड़ता।
............जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

भगवत्प्राप्ति का एक ही मूल्य है, गुरु-शरणागति | हम गुरु के प्रति शरणागत क्यों नहीं होते, क्योंकि हमारे मन में है कि अरे सारी रात भर कीर्तन है, गुरुजी ने आज्ञा दी और सोने चले गये तो सोचा कि गुरुजी तो अब सोने चले गये, चलो, हम भी सोने चले जाते हैं, गुरु जी को क्या मालूम पड़ेगा सुबह जल्दी वापस आ जायेंगे | यही मक्कारी ही हम लोगों का पतन कराती है | यही कारण है कि हम कई बार आगे बढ़ते-बढ़ते फिर गिर जाते हैं |
.............जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

तुम 'कृपालु' को क्या दोगे? 'कृपालु' तुमसे कुछ लेने नहीं देने आया है।
.......श्री महाराज जी।

Monday, August 4, 2014

बचपन में ही भक्ति में लग जाओ तो युवा अवस्था का नशा हावी नहीं होगा,फ़िर संस्कार बन जायेंगे तो भगवान की और युवा अवस्था में भी चलोगे।
.........श्री महाराजजी।


राधे राधे बोल नित , करू राधे को ध्यान।
ऐहैँ निज गोलोक तजि , भाजत श्याम सुजान।।८०।।

भावार्थ - निरंतर श्री राधिका का ध्यान करते हुए उनका नामादि संकीर्तन करो। इसी साधना से श्यामसुंदर बिना बुलाये भागे भागे अपना लोक छोड़कर आ जायेंगे। राधे नाम से श्यामसुन्दर को इतना अनुराग है।
भक्ति शतक (दोहा - 80)
-जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
(सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति)

श्याम बिनु, भई श्याम हौं वीर |
तनु झुलसत परि विरह – दवानल, धरत न उर अब धीर |
इत हौं विरहिनि जरी जात उत, दृग बरसावत नीर |
याते जरत न बुझत, रहत नित, सुलगत गौर शरीर |
रसिक – शिरोमणि बिनु सखि ! को यह, जानि सके उर पीर |
तनुहिं ‘कृपालु’ श्याम नहिं मनहूँ, श्याम देखु उर चीर ||

भावार्थ – एक विरहिणी कहती है कि अरी सखी ! मैं तो श्यामसुन्दर के बिना श्याम रंग की हो गयी, अर्थात् काली पड़ गयी | विरह की प्रदीप्त अग्नि में प्रतिक्षण जलती रहती हूँ, हृदय में किसी प्रकार से भी धैर्य नहीं आता | एक ओर तो विरहाग्नि मुझे जलाती है एवं दूसरी ओर आँखों से मैं आँसू बरसाती हूँ | इसलिये मेरा यह गौर रंग का शरीर न तो जलता ही है और न बुझता ही है, निरन्तर सुलगता ही रहता है | अरी सखी ! रसिक शिरोमणि प्यारे श्यामसुन्दर के बिना मेरी हृदय स्थित वेदना को दूसरा कौन समझ सकता है | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि अरी सखी ! तेरी देह ही श्याम नहीं है वरन् तेरा मन भी श्याम है | यदि तुझे विश्वास न हो तो हृदय फाड़कर देख ले, उसमें काले श्यामसुन्दर बैठे हैं |
( प्रेम रस मदिरा विरह - माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति

'हरि' में 'हरि व गुरु' , एवं 'गुरु' में भी 'हरि गुरु' दोनों समाहित हैं यह 'ज्ञान' सदैव स्मरण रहना चाहिये।
..........श्री महाराज जी।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...