Friday, August 8, 2014

अकिंचन बन कर ; शुद्ध , सरल , निष्कपट भाव से जब साधक पुकारता है , तब वह अकारण - करुण भगवान् अपनी कृपा से उसे किसी महापुरुष से मिला देते हैं !
------------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु.

जो आदेश मैंने तुमको दिया है: दीनता, मधुरभाषण, नम्रता , उनका पालन तुम लोग अभी नहीं कर रहे हो। एक भिक्षा माँग रहा हूँ, तुम लोग लापरवाही कर रहे हो, यह बुरी बात है।
तुम्हारा कृपालु .

ये उदासीयों का मौसम मेरी जिन्दगी ना ले ले .........!
मेरा दम निकल ना जाये , तुझे याद करते-करते ............!!
राधे-राधे।

क्या आप लोग एक दिन भी वस्त्र पहनना भूलते हैं घर से बाहर निकलते समय???
कभी नहीं भूलते...........

इसी प्रकार भगवान को भी सदा याद रखना होगा। यदि एक क्षण के लिए भी मन से भूल गए तो पाप करने लगेंगे हम लोग। हर समय, हर स्थान पे ये स्मरण बना रहे मन में कि हरि/गुरु सदा हमारे विचारों को नोट कर रहे हैं। अगर कोई केवल इतना ही कर ले तो भगवत प्राप्ति हो जाये और कोई साधना करने की आवश्यकता ही नहीं है।
.........जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज।

Tuesday, August 5, 2014

मन में निश्चय करो की हमारा लक्ष्य भगवान ही रहें, हम भगवान के लिए ही सब काम करें, भगवान के लिए ही जियें और अंत में भगवान का स्मरण करते हुए ही इस नश्वर शरीर को त्याग कर भगवान के चरणों में चलें जाएँ ।
जय श्री राधे।

श्रीकृष्ण, उनके नाम, उनके गुण, उनकी लीला, उनके धाम, उनके संतजनो में पूर्ण अभेद मानना है। यह सब श्री कृष्ण ही है।

केवल गुणगान करने से भी काम नहीं चलेगा। गान तो गवैये भी करते है , लेकिन उनको भगवत्प्राप्ति नहीं होती।
अतएव गुणगान करते समय तदनुसार भाव भी लाओ।
जैसे :- हम बहुत अधम है ,पतित है ,अनंत जन्मो के किये अनंत पापों की गठरी सर पैर लिए हैं और वे अकारण करुण,भक्त -वत्सल ,पतित -पावन ,अधम -उधारंहार आदि हैं।
........श्री कृपालु जी महाप्रभु।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...