Sunday, August 10, 2014

हरिदासी हैँ मुक्ति सब , सबै जीव हरिदास।
महामूढ़ जो स्वामी तजि , कर दासी की आस।।८७।।

भावार्थ - सभी मुक्तियाँ भगवान् श्रीकृष्ण की दासी हैं और समस्त जीव नित्य दास हैं। जो दास (जीव) अपने स्वामी को छोड़कर दासी (मुक्ति) की आशा करता है। वह महामूर्ख है।
भक्ति शतक (दोहा - 87)
-जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
(सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति)
अली ! यह मुरली बुरी बलाय |
भई बावरी गोपिन डोलति, जनु कोउ मूठि चलाय |
कोउ धावति, कोउ दृग झरि लावति, कोउ करति मुख ‘हाय’ !|
लोक – वेद – कुल – कानि – आनि – तजि, गई कोउ बौराय |
आनन धरे हिरन तृन कानन, नेकु न सकेउ चबाय |
शुक, सनकादि, शंभु आदिक जे, तेउ समाधि भुलाय |
बधिर ‘कृपालु’ करत कत अचरज, जो न ठगोरी आय ||

भावार्थ – एक गोपी कहती है कि यह मुरली तो बुरी बला है | इसकी तान सुनकर समस्त ब्रज – गोपियाँ दीवानी – सी बनकर डोलती हैं | जैसे किसी ने इन पर जादू कर दिया हो | कोई गोपी भागती है, कोई घर से न निकल सकने के कारण आँसू बहाती हैं एवं कोई मुरली की तान सुनते ही अपने मुख से हाय ! हाय !! कहती है | कोई तो लोक परलोक का ध्यान छोड़कर वास्तव में ही पागल हो जाती है | वन में मृग अपने मुख में घास रख कर न तो उसे चबा ही सकते हैं और न उगल ही सकते हैं | बड़े – बड़े ज्ञानी शुकदेव, सनकादिक एवं शंकरादिक भी अपनी – अपनी समाधि भूल गये | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि तू बहरा होने के कारण यह आश्चर्य मत कर कि मैं तो मुरली की ठगाई में नहीं आया |
( प्रेम रस मदिरा मुरली - माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति

Shri Maharaj Ji reminds us:
If you have attained the human body and a genuine Guru, you have attained the ultimate Grace of God. After that, the only thing that remains is your effort.

दिव्य प्रेमास्पद का दिव्य प्रेम ही सर्वोत्कृष्ट तत्व है। प्रेम का तात्पर्य तत्सुख सुखित्वं अर्थात प्रेमास्पद के सुख में ही सुख मानना है।
........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

मानवदेह का सर्वाधिक महत्व सोचकर एक-एक क्षण मूल्यवान मानो, एवं अनावश्यक समय का अपव्यय ना करो।
-------श्री महाराज जी।

श्री महाराजजी के सभी सत्संगीयो के लिए हमारी प्यारी-प्यारी दीदियों(VSK) का सन्देश:
हमारी प्यारी-प्यारी दीदियों की आज्ञा है की सभी सत्संगी कुसंग से जितना हो सके उतना बचे,अधिक से अधिक संकीर्तन करें,आँसू बहाये,श्री महाराजजी ने हर एक जीव को बेहिसाब प्यार दिया है हम सबको पहचान ही श्री महाराजजी से मिली है,आज श्री महाराजजी अदृश्य जरूर हो गए हैं मगर क्या वो अपने बच्चों से उनके लिए दिन रात आँसू बहाने वालों से क्षण भर के लिए भी दूर रह सकते हैं????.....श्री महाराजजी का प्यार हमे अनंत जन्मों तक भी लगातार मिलता रहे तो भी हम उनकी असल महिमा उनकी करुणा उनके वात्सल्य को नहीं समझ पायेंगे। क्योंकि हमारा अंत:करण ही कीचड़ से भी अधिक मलिन है पर हमारे सिर्फ साधना और सिद्धान्त ही काम आना है इसलिए रोज़ नियमित रूप से श्री महाराजजी की स्पीच सुननी है और रूपध्यान करके आँसू बहाकर साधना करनी है ताकि हमारे प्रभु फिर हमें अपने दर्शन का सौभाग्य प्रदान करें।
राधे-राधे।

Today is the festival of Raksha Bandhan.
On this auspicious day, let us ask for Yugal Sarkar to come to us with their arms around each other, in order to protect us from maya.

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...