Sunday, August 10, 2014

दिव्य प्रेमास्पद का दिव्य प्रेम ही सर्वोत्कृष्ट तत्व है। प्रेम का तात्पर्य तत्सुख सुखित्वं अर्थात प्रेमास्पद के सुख में ही सुख मानना है।
........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

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मन का अटैचमेंट किसमें करें?

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