Monday, August 11, 2014

तेरे हाथ से.....मेरे हाथ तक..... वो जो हाथ भर का था फ़ासला............!
उसे नापते.......उसे काटते.......मेरे अनंत जन्म गुज़र गये........!!
राधे-राधे।
अब मैं रोज़ एक नया शेर कहाँ तक लिखूँ तुम्हारे लिये........!
तुम्हारी तो हर रोज़ ही एक नयी बात हुआ करती है ................!!
राधे-राधे।

'आज' नहीं 'कल' कर लेंगे,बस वो कर ले,बस ये कर लें,बस फिर भजन करेंगे.......इस प्रकार अनंत जन्म गँवा दिये लेकिन वह 'आज' और वो 'कल' कभी ना आ सका।
.........श्री महाराजजी।

संसार के अभाव से वैराग्य है अगर, तो वो संसार का वैराग्य नहीं है, जेसे आपके पास धन नहीं है, और धन से वैराग्य है, जेसे आपको बेटा नहीं हे और बेटे से वैराग्य है, तो यह सही वैराग्य नहीं है। यह तो संसार के अभाव से वैराग्य है , संसार से वैराग्य नहीं है। सही वैराग्य तो तब माना जायेगा जब आपके पास सब कुछ हो जैसे माँ भी हो, बाप भी, बेटा भी हो, धन भी हो और आप समझे रहें की यह सब मिथ्या है। यह है सच्चा वैराग्य।
------श्री महाराजजी।

जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु के श्रीमुख से:
क्रोध आया कि सर्वनाश हुआ। बदतमीज़ कहने पर 'बदतमीज़' बन गए। आप इतने बड़े मूर्ख हैं कि एक मूर्ख ने 'मूर्ख' कह कर आपको मूर्ख बना दिया।

बलि जाउँ निकुंज विहार की |
नागरि श्री वृषभानु कुँवरि अरु, नागर नंदकुमार की |
धरि जनु रूप अनूप प्रकट भइँ, मूरति छवि श्रृंगार की |
करत केलि भुज मेलि विविध विधि, बरसावत रसधार की |
संग नवेलिन, अति अलबेलिन, हेलिन यूथ अपार की |
पियत ‘कृपालु’ रसिक निशि वासर, प्रेम सुधा रस सार की ||

भावार्थ – एक सखी कहती है – मैं प्रिया – प्रियतम के निकुंज में विविध प्रकार के रास – विहार की बार – बार बलैया लेती हूँ | मैं प्रेम रस की आचार्या वृषभानुनन्दिनी एवं रसिक शिरोमणि नँदनंदन की बार – बार बलैयाँ लेती हूँ | मानो श्रृंगार एवं रूप की मूर्ति ही साक्षात् राधा – कृष्ण का स्वरूप धारण करके प्रेम के अन्तरंग रसों को बरसाने के लिए अवतरित हुयी है | प्रिया – प्रियतम परस्पर गले में हाथ डाले हुए विविध प्रकार की अन्तरंग लीला विहार करते हुए प्रेम रस को मूसलाधार बरसा रहे हैं, मैं उसकी भी बलैयाँ लेती हूँ | प्रिया – प्रियतम के साथ किशोर अवस्था वाली प्रेमरस की रँगीली अनंत गोपियों के झुण्ड की बार – बार बलैया लेती हूँ | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि प्रेमरस के सार – स्वरूप अमृत को रसिक लोग निरंतर ही पिया करते हैं |
( प्रेम रस मदिरा निकुंज – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति

वंदनीय है उपनिषत , यामे ज्ञान महान।
श्याम प्रेम बिनु ज्ञान सो , प्राणहीन तनु जान।।८८।।

भावार्थ - उपनिषत् भगवत्स्वरूप हैं। अतः वन्दनीय हैं। उनमें अनंत ज्ञान भरा पड़ा है। किन्तु उनसे श्रीकृष्ण प्रेम नहीं बढ़ता। अतः वह ज्ञान , प्राणहीन शरीर के समान है।
भक्ति शतक (दोहा - 88)
-जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
(सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति)

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...