This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Monday, August 11, 2014
संसार
के अभाव से वैराग्य है अगर, तो वो संसार का वैराग्य नहीं है, जेसे आपके
पास धन नहीं है, और धन से वैराग्य है, जेसे आपको बेटा नहीं हे और बेटे से
वैराग्य है, तो यह सही वैराग्य नहीं है। यह तो संसार के अभाव से वैराग्य है
, संसार से वैराग्य नहीं है। सही वैराग्य तो तब माना जायेगा जब आपके पास
सब कुछ हो जैसे माँ भी हो, बाप भी, बेटा भी हो, धन भी हो और आप समझे रहें
की यह सब मिथ्या है। यह है सच्चा वैराग्य।
------श्री महाराजजी।
------श्री महाराजजी।
बलि जाउँ निकुंज विहार की |
नागरि श्री वृषभानु कुँवरि अरु, नागर नंदकुमार की |
धरि जनु रूप अनूप प्रकट भइँ, मूरति छवि श्रृंगार की |
करत केलि भुज मेलि विविध विधि, बरसावत रसधार की |
संग नवेलिन, अति अलबेलिन, हेलिन यूथ अपार की |
पियत ‘कृपालु’ रसिक निशि वासर, प्रेम सुधा रस सार की ||
नागरि श्री वृषभानु कुँवरि अरु, नागर नंदकुमार की |
धरि जनु रूप अनूप प्रकट भइँ, मूरति छवि श्रृंगार की |
करत केलि भुज मेलि विविध विधि, बरसावत रसधार की |
संग नवेलिन, अति अलबेलिन, हेलिन यूथ अपार की |
पियत ‘कृपालु’ रसिक निशि वासर, प्रेम सुधा रस सार की ||
भावार्थ – एक सखी कहती है – मैं प्रिया – प्रियतम के निकुंज में विविध
प्रकार के रास – विहार की बार – बार बलैया लेती हूँ | मैं प्रेम रस की
आचार्या वृषभानुनन्दिनी एवं रसिक शिरोमणि नँदनंदन की बार – बार बलैयाँ लेती
हूँ | मानो श्रृंगार एवं रूप की मूर्ति ही साक्षात् राधा – कृष्ण का
स्वरूप धारण करके प्रेम के अन्तरंग रसों को बरसाने के लिए अवतरित हुयी है |
प्रिया – प्रियतम परस्पर गले में हाथ डाले हुए विविध प्रकार की अन्तरंग
लीला विहार करते हुए प्रेम रस को मूसलाधार बरसा रहे हैं, मैं उसकी भी
बलैयाँ लेती हूँ | प्रिया – प्रियतम के साथ किशोर अवस्था वाली प्रेमरस की
रँगीली अनंत गोपियों के झुण्ड की बार – बार बलैया लेती हूँ | ‘श्री कृपालु
जी’ कहते हैं कि प्रेमरस के सार – स्वरूप अमृत को रसिक लोग निरंतर ही पिया
करते हैं |
( प्रेम रस मदिरा निकुंज – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति
( प्रेम रस मदिरा निकुंज – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति
वंदनीय है उपनिषत , यामे ज्ञान महान।
श्याम प्रेम बिनु ज्ञान सो , प्राणहीन तनु जान।।८८।।
भावार्थ - उपनिषत् भगवत्स्वरूप हैं। अतः वन्दनीय हैं। उनमें अनंत ज्ञान भरा पड़ा है। किन्तु उनसे श्रीकृष्ण प्रेम नहीं बढ़ता। अतः वह ज्ञान , प्राणहीन शरीर के समान है।
श्याम प्रेम बिनु ज्ञान सो , प्राणहीन तनु जान।।८८।।
भावार्थ - उपनिषत् भगवत्स्वरूप हैं। अतः वन्दनीय हैं। उनमें अनंत ज्ञान भरा पड़ा है। किन्तु उनसे श्रीकृष्ण प्रेम नहीं बढ़ता। अतः वह ज्ञान , प्राणहीन शरीर के समान है।
भक्ति शतक (दोहा - 88)
-जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
(सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति)
-जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
(सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति)
Subscribe to:
Posts (Atom)
मन का अटैचमेंट किसमें करें?
एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...
-
Baar Baar suno, Baar Baar suno, tab tatvagyan paripakva hoga. Ye jo hum Logo ko Brham hota hai ki yeh to maine bahut suna hai, yeh to mein j...
-
गुरु में हरिबुद्धि रखो सदा गुरुधामा | नरबुद्धि आने नहिं पाये आठु यामा || गुरु के प्रति सदैव भगवद् बुद्धि ही रखो | निरन्तर यह सावधानी र...
-
ए # मनुष्यों ! # मानव_देह प्राप्त हुआ है , # भगवतप्राप्ति के लिये केवल, इसकाे मत गँवाओ, व्यर्थ # भाेग_विलास में केवल लिप्त रह कर...






