Monday, August 11, 2014

"काम क्रोध मद लोभ तजहु जनि , भजहु तिनहिं दिन रात"।।
अब कामना यह हो की श्याम सुन्दर मुझे कब मिलेंगे? क्रोध यह हो कि उनके मिलन बिना व्यर्थ में जीवन बीता जा रहा है , लोभ यह हो कि उनसे मेरा निष्काम प्रेम बढ़ता ही जाये। मद यह हो कि हम उनके दास हैं। इस प्रकार सभी कामनाओ को श्याम चरणों में समर्पित करने से और रो रो कर उन्हें पुकारने से हमारा अन्तःकरण शुद्ध हो जायेगा।
..........जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।

सबकुछ माँग लिया है , बस तुमको माँग कर........!
उठे नहीं हैं हाथ मेरे , फिर इस दुआ के बाद ..............!!
राधे-राधे।

आज तो है रक्षाबन्धन नन्दनन्दन।
रक्षा करूँ रक्षा करूँ मेरे नन्दनन्दन।।

वजह पूछोगे तो सारी उम्र गुजर जायेगी......!
कहा ना अच्छे लगते हो तो, बस लगते हो.......!!
राधे-राधे।

श्यामा श्याम कहें गुरु भजो आठु यामा।
गुरु कहें आठों याम भजो श्याम श्यामा।।

shyama shyam kahen guru bhajo athu yama.
guru kahen athun yam bhajo shyam shyama.

Shyama Shyam insist on the worship of the Guru while the Guru insist on the worship of Shyam Shyama.
Shyama Shyam Geet - 87
-Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj.
Radha Govind Samiti.

मैंने तो सदा को तुमको अपना बना लिया है, अब तुमको मुझसे अपनापन बढ़ाना है।
I have made you Mine Forever, now it's your turn to Increase your Belongingness and Love for Me.
-----श्री 'कृपालु' गुरुवर (जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज)।

मानिनी ! मान की बान बुरी |
तव छवि मधु – मखियाँ पिय – अँखियाँ, नहिं मानति निगुरी |
निकसन चह असुरी अब तुम बिन, सुधि भूली बँसुरी |
पुनि पुनि कहत बिलखि ‘हा राधे !, कुंजनि कौन दुरी’ |
दुहुँन रुवावति मान – बानि यह, विष की बुझी छुरी |
तुम ‘कृपालु’ दोउ विलग न रहि सक, ज्यों घन ते बिजुरी ||

भावार्थ - ( मानिनी किशोरी जी को मनाती हुई ललिता की उक्ति | )
हे किशोरी जी ! तुम्हारी यह बार – बार रूठ जाने की बात अच्छी नहीं है | प्रियतम की आँखें तुम्हारे रूप की मधुमक्खियाँ बन चुकी हैं | वे अब तुम्हारे बिना किसी भी प्रकार से प्रियतम को चैन नहीं लेने देती | अब प्रियतम के प्राण निकलना ही चाहते हैं एवं उन्हें अब तुम्हारे आगे अपनी प्राणाधिक – प्रिय मुरली का भी ध्यान नहीं रहा | वे बार – बार व्याकुल होकर कहते हैं ‘हा राधे ! तुम कौन से कुंज में छिप गयीं ?’ हे किशोरी जी ! यह विष की बुझी हुई छुरी के समान मान की बान तुम दोनों को रुलाती है, अतएव इसे छोड़ो | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि तुम दोनों एक – दूसरे से पृथक् उसी प्रकार नहीं रह सकते जिस प्रकार बादलों से बिजली |

( प्रेम रस मदिरा मान - माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...