Friday, September 19, 2014

संत ही सच्चा देवता है ! संत ही अपना है ! वही हमारा सच्चा हितैषी है !
-----श्री महाराज जी .

हमारे स्वार्थ के द्रष्टिकोण से गुरु का ही स्थान ऊँचा है। भगवान् तो हमें प्रारम्भ में मिलेंगे नहीं। हमको ए . बी . सी . डी गुरु ही पढ़ायेगा। गुरु ही साधना करायेगा। हम उसके प्रति दुर्भावना भी करते हैं तो भी वो सहन करके मुस्कुराता रहता है। अभी बच्चा है , ज्ञान हो जायेगा तो ठीक हो जायेगा। वो हमारे पीछे पड़ा रहता है। जब हमारा अंतःकरण शुद्ध हो जायेगा। तो फिर वही गुरु ही उसको दिव्य बनायेगा स्वरूप शक्ति के द्वारा। फिर वही गुरु भगवान् से मिलायेगा। अतः यधपि हरि गुरु एक ही हैं किन्तु -
प्रथम नमन गुरुवर पुनि गिरिधर।
--------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु।

Thursday, September 18, 2014

It is a matter of great astonishment that one does not give up hope in trying to attain happiness in the world which does not have a trace of Bliss, but one so easily gives up hope on the path to God, where the attainment of Infinite Bliss is guaranteed.
.........SHRI MAHARAJJI.

विचार कीजिये!
आज धन है, कल नहीं है, आज बल है, कल बुढ़ापा आ गया, आज रूप है कल कुरूप हो गये, जो कुछ है सीमित है वह भी एक सा नहीं रहेगा। और फिर एक दिन सारा का सारा जीरो(zero) हो जायेगा और लोग कहेंगे- आज वह चला गया।
------'जगद्गुरु श्री कृपालु महाराज' के श्रीमुख से।

'गुरु' खोजने से 'गुरु' नहीं मिलते, 'हरि' खोजने से, 'हरि कृपा' से, 'गुरु' मिलते हैं। और इन्हीं 'गुरु' के माध्यम से फिर आपको 'हरि' मिलते हैं।
...........श्री महाराजजी।

Wednesday, September 17, 2014

भक्ति में अनन्यता परमावश्यक है। हमारे मन की आसक्ति 'भक्ति', 'भक्त', 'भगवान' के अतिरिक्त और कहीं नहीं होनी चाहिए।
------श्री कृपालु जी महाप्रभु।

हे श्रीकृष्ण ! यदि दीनता से ही तुम कृपा करते हो तो वह तो मेरे पास थोड़ा भी नहीं है । अतः पहले ऐसी कृपा करो कि दीन भाव युक्त बनूँ ।' ऐसा कह कर आँसू बहाओ । यह करना पड़ेगा । मानवदेह क्षणिक है । जल्दी करो । पता नहीं कब टिकिट कट जाय ।
यह मेरा नम्र निवेदन सभी से है ।
--------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...