This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Friday, September 19, 2014
हमारे
स्वार्थ के द्रष्टिकोण से गुरु का ही स्थान ऊँचा है। भगवान् तो हमें
प्रारम्भ में मिलेंगे नहीं। हमको ए . बी . सी . डी गुरु ही पढ़ायेगा। गुरु
ही साधना करायेगा। हम उसके प्रति दुर्भावना भी करते हैं तो भी वो सहन करके
मुस्कुराता रहता है। अभी बच्चा है , ज्ञान हो जायेगा तो ठीक हो जायेगा। वो
हमारे पीछे पड़ा रहता है। जब हमारा अंतःकरण शुद्ध हो जायेगा। तो फिर वही
गुरु ही उसको दिव्य बनायेगा स्वरूप शक्ति के द्वारा। फिर वही गुरु भगवान्
से मिलायेगा। अतः यधपि हरि गुरु एक ही हैं किन्तु -
प्रथम नमन गुरुवर पुनि गिरिधर।
--------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु।
प्रथम नमन गुरुवर पुनि गिरिधर।
--------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु।
Wednesday, September 17, 2014
हे
श्रीकृष्ण ! यदि दीनता से ही तुम कृपा करते हो तो वह तो मेरे पास थोड़ा भी
नहीं है । अतः पहले ऐसी कृपा करो कि दीन भाव युक्त बनूँ ।' ऐसा कह कर आँसू
बहाओ । यह करना पड़ेगा । मानवदेह क्षणिक है । जल्दी करो । पता नहीं कब
टिकिट कट जाय ।
यह मेरा नम्र निवेदन सभी से है ।
--------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
यह मेरा नम्र निवेदन सभी से है ।
--------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
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