Wednesday, March 11, 2015

जब दीनता आयेगी तब आँसुओं के ढेर लगेंगे। प्रत्येक व्यक्ति तुमको अपने से ऊँची स्टेज का साधक लगेगा।
!! जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज !!
संत संग सत्संग करू , तिन सेवहु दिन रात।
श्रद्धा , रति , अरु भक्ति सब , आपुहिं तेहि मिली जात।।५०।।

भावार्थ - किसी वास्तविक रसिक की शरण ग्रहणकर , उनका सतत सत्संग करते रहने से श्रद्धा , रति एवं भक्ति क्रमशः स्वयं प्राप्त हो जाती है।
भक्ति शतक (दोहा - 50)
-जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
(सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति)

बिनु हरि कृपा न पाई सक , ज्ञानिहुँ ब्रहम ज्ञान।
ब्रहम अकर्ता वेद कह , सोचहु मनहिँ सुजान।।४९।।

भावार्थ - बिना सगुण साकार भगवान् की कृपा के ज्ञानी को भी ब्रहमज्ञान नहीं हो सकता। क्योंकि ज्ञानियों का ब्रहम कुछ नहीं करता। फिर कृपा करने का तो प्रश्न ही नहीं है।
भक्ति शतक (दोहा - 49)
---जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
(सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति)

Tuesday, March 10, 2015

हाय दई, यह कैसी भई री |
केहि विधि कासों कहूँ आपनी, जार प्रेम की बात नई री |
देखन को छोटा अति खोटा, नँद – ढोटाहिं ठगाय गई री |
भई लटू मैं भटू पटू ह्वै, नेकु हँसनि मन बेच दई री |
पलक शब्द विपरीत भयो अब, विष – बेलरि उर माहिं बई री |
सिगरो जन सूनो सो दीखत, विरह घटा नैनन उनई री |
यह ‘कृपालु’ पिय – प्रेम विषामृत, परम चतुर दै शीश लई री ||

भावार्थ – एक विरहिणी सखी से कहती है कि हाय ! यह तो बड़ा ही बुरा हुआ | अब इस परपुरुष – रूप श्यामसुन्दर के प्रेम की बात को किस प्रकार किसी से कहूँ | देखने में तो वह नन्द का लाल छोटा ही है, किन्तु वह इतना खोटा है कि मुझ अत्यन्त चतुर को भी ठग लिया | अरी सखी ! मैं चतुर होते हुए भी थोड़ी – सी मुस्कान के ऊपर अपने मन को बेचकर उस पर दीवानी हो गयी | अब हमारे लिए एक – एक पल कल्प के समान हो गया है ( पलक शब्द का उल्टा कलप ) एवं हृदय में विरह की विष – बेल फैल गई है | मुझे सारा संसार शून्य – सा प्रतीत होता है, एवं विरह के बादल आँखों से आँसू बरसा रहे हैं | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि अरी सखी ! यह विष एवं अमृत मिला हुआ प्रेम जो तुझे मिला है वह बड़े – बड़े ज्ञानियों के लिए भी दुर्लभ है | इसको पाने कि लिए तो अत्यन्त ही चतुर अपना शीश प्रदान करते हैं |
( प्रेम रस मदिरा विरह – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति
हमलोग संसार में सुख ढूँढते हैं जगह-जगह और कहीं पर सुख है ही नहीं तो मिलेगा कहाँ से,आनंद को छिपा लिया है भगवान ने इस संसार में रखा ही नहीं है।
........श्री कृपालु महाप्रभु।

हरि गुरु की सेवा से, हरि गुरु के निरंतर स्मरण से हमारा अन्तः करण शुद्ध होगा ।
ये प्रतिज्ञा कर लो सब लोग की जब आपस मे मिलो तो केवल भगवद् चर्चा करो और यदि दूसरा न करे तो वहाँ से तुरंत चले जाओ, हट जाओ । इस प्रकार कुसंग से बचो । जो कमाइए उसको लॉक करके रखिए, लापरवाही मत कीजिये।
...........श्री महाराजजी।
सारा जीवन श्री महाराज जी ने हमारे कल्याण के लिए समर्पित किया.. क्षण क्षण हमारे उत्थान के लिए आतुर उन्होंने हम जीवों की ही सेवा की..!!!
उनका ऋण, उनके उपकार हम पर इतना है कि न वे गिने जा सकते हैं, न समझे जा सकते हैं, न कभी उतारे ही जा सकते है..
उनकी कही बातें, उनके आदेश हम सहर्ष मानें.. वे जैसे भी सुख पाते हैं, वैसा करें, वैसा बनें... इतना तो कर ही सकते है. इसमें हमारा ही कल्याण है..!!!
संसार की आसक्ति को हटाकर हरि-गुरु में प्रेम बढ़ाएंगे.. नित्य निरंतर उन्हीं का चिंतन करेंगे.. उन्हीं की सेवा के लिए प्लानिंग करेंगे.. उनकी कृपाओं को सोच सोच कर बलिहार जायेंगे और अपनी गलतियों की क्षमायाचना तथा उनकी सेवा और प्रेम पाने के लिए निष्काम रुदन करेंगे..!!!
फिर भी भला हम पामर जीव उनका क्या उपकार उतार पाएंगे.. 'आज्ञा सम न सुसाहिब सेवा'.. यही मानकर उनके कहे पर चल सकते हैं।
करुणावरुणालय उन 'कृपालु' गुरुदेव की सदा जय हो........!

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...