Tuesday, March 17, 2015

सद्गुरु के पास किसी को इंकार नहीं है। जो डूबने को राजी है सद्गुरु उसे लेने को तैयार है। वह शर्ते नहीं रखता। वह पात्रताओं के जाल खडे नहीं करता। अपात्र को पात्र बना ले, वही तो सद्गुरु है। अयोग्य को योग्य बना ले वही तो सद्गुरु है। संसारी को सन्यासी बना ले, वही तो सद्गुरु है।
"गुरु: कृपालुर्मम शरणम, वंदेsहं सद्गुरु चरणम।"
जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु के दिव्य चरणों में कोटि-कोटि नमन.....!!!
मानवदेह का सर्वाधिक महत्व सोचकर एक-एक क्षण मूल्यवान मानो, एवं अनावश्यक समय का अपव्यय ना करो।
-------श्री महाराज जी।
एक बात याद रखो बस, अन्तःकरण का सम्बन्ध भगवान से और गुरु से हो। केवल सिर को पैर पर रख देने से काम नहीं बनेगा,आरती कर लेने से काम नहीं बनेगा,दक्षिणा दे देने से काम नहीं बनेगा। ये सब हेल्पर है। तुम्हारे पास जो कुछ है दो,सब ठीक है। सर्व समर्पण करना है गुरु को ,भगवान को, लेकिन इतने मात्र से काम नही बनेगा। 'अनुराग' सबसे प्रमुख है ,अन्तःकरण से प्यार।
-------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

Friday, March 13, 2015

वास्तविक महापुरुष के सान्निध्य में संसार से सहज वैराग्य एवं भगवान में सहज अनुराग बढ्ने लगता है। तत्वज्ञान परिपक्व होने लगता है। जीव अवश्य महसूस करने लगता है कि वो कल्पना भी नहीं कर सकता था की भगवदविषय में कभी इतना मन लगने लगेगा, इतना समय वो दे पाएगा।

जैसे कोई अन्धा किसी दूसरे अन्धे से कहे तू नेत्रवान है मुझे घर पहुँचा दे , उसी प्रकार संसार में किसी भी प्राणी के पास सुख नहीं है किन्तु परस्पर सभी एक दुसरे से सुख की आशा लगाये हैं।
.........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु।

"Dear Devotees,
Practice, Practice and Practice!
Withdraw your mind from the world and engage it in God. Make it your spiritual practice to do so again and again . . ."
........SHRI MAHARAJ JI.

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...