Tuesday, June 7, 2016

मन एवं सांसारिक पदार्थ सजातीय होने के कारण एक दूसरे के सहयोगी हैं।

----श्री महाराजजी।
कुसंग से बचो ......!!!

भक्ति विरोधी हर ज्ञान , वस्तु , व्यक्ति कुसंग है। अपने गुरु , मार्ग , इष्ट को छोड़कर अन्य का संग कुसंग है।
......श्री महाराजजी।
तृष्णा की नदी गहरी है, शरीर रूपी नाव जीर्ण है, अतएव बिना कुशल नाविक सद्गुरु के तुम भवसागर से कैसे पार उतरोगे। सद्गुरु की शरण ही संसार -सागर से बचाने वाली है।

जय श्री राधे।
जितनी देर जिस गहराई से मन भगवदीय उपासना में तल्लीन रहेगा , वही भगवदीय उपासना नोट होगी। बाकि सब की सब माया की उपासना में नोट की जायेगी।
.......श्री महाराजजी।

"छोटी काशी, जयपुर (गुलाबी नगरी) ,राजस्थान" में त्रि-दिवसीय भक्तियोग साधना शिविर का आयोजन।
इस युग के परमाचार्य पंचम मूल जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज की असीम अनुकम्पा से उनकी प्रचारिका सुश्री श्रीधरी जी द्वारा 'जगद्गुरु कृपालु परिषत' की तीनों अध्यक्षाओं परमपूज्या सुश्री डॉ.विशाखा त्रिपाठी(बड़ी दीदी),सुश्री डॉ.श्यामा त्रिपाठी(मझली दीदी),सुश्री डॉ.कृष्णा त्रिपाठी(छोटी दीदी) के पावन सानिध्य में गुलाबी नगरी ,जयपुर में तीन दिवसीय भक्तियोग साधना शिविर का आयोजन।
दिनाँक: 1जुलाई से 3 जुलाई,2016.
नोट: इस साधना शिविर में रजिस्ट्रेशन हेतु कृपया 'sharadgupta40@yahoo.com' पर ई-मेल करें या अन्य जानकारी हेतु मेरे inbox में भी सम्पर्क कर सकते हैं। शिविर में भाग लेने हेतु रजिस्ट्रेशन अनिवार्य है। रजिस्ट्रेशन की अंतिम तिथि 15 जून 2016 है।

रक्षिष्यतीति विश्वास:- ये विश्वास रखो कि हरि-गुरु हमारी रक्षा करेंगे। हम चलें निर्भय होकर चलें ईश्वर की ओर ,वे योगक्षेम वहन करेंगे उनका कानून है। अकाट्य कानून है। करेंगे कि नहीं करेंगे,करेंगे कि नहीं करेंगे मुँह से पूछें या लिखकर पूछें। अरे लिखना पढ़ना पूछना कुछ नहीं है। वो कानून है वो तो करना ही पड़ेगा उनकी ड्यूटि है और रक्षा कर रहे हैं ये भी realize करना है।

--------सुश्री श्रीधरी दीदी (प्रचारिका),जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।

श्री महाराजजी के श्रीमुख से:
एक बात है बड़ी इंपोर्टेंट(IMPORTANT)। हरि- गुरु को अपने साथ ,सर्वत्र ,सर्वदा महसूस करो। इसका अभ्यास करो। दस दिन ,बीस दिन, महीने, छ: महीने में यह अभ्यास पक्का हो जायेगा कि हम अकेले नहीं हैं। हम जहां अपने को अकेला मानते हैं वहीं पाप कर बैठते हैं - प्राइवेट। अरे, वेद कहता है, अगर तुम गुरु को न भी मानो तो भगवान को तो मानो कि अंत:करण में वो नित्य हमारे साथ है, हमारे आइडिया नोट कर रहा है। तो हरि-गुरु को अपने साथ अपना रक्षक मानो। यह फीलिंग हो - हम अकेले नहीं हैं,सदा वे हमारे साथ है।गलत काम न करें ,गलत चिंतन न करें । सावधानी आयेगी तो अपराध से बचेंगे।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...