Tuesday, June 7, 2016

जय जय राम,जय जय राम,जय जय राम,जय जय राम।
आओ भरत शत्रुघन लछिमन राम,लाओ जनकनंदिनीहुँ सँग महँ राम।
जिओ जुग जुग चारिहुँ भइयन राम, जय जय जुग जुग जिये जोरी सीता राम।

------- जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।
हरि गुरु के प्रति अनन्य भक्ति हो और निष्काम हो। उनकी इच्छा में इच्छा रखना ,उनको सुख देना, तन मन धन से सेवा करना,अपना सर्वस्व मानना,निरंतर मानना,यही प्रेम है,शरणागति है। जिसने ये शर्तें पूरी कर दीं वो कृतार्थ हो गया। जिसने नहीं पूरी कीं वो चौरासी लाख योनियों में जैसे कोल्हू का बैल होता है ऐसे घूम रहा है बेचारा ।

..........जगद्गुरुत्तम श्री कृपालुजी महाप्रभु।
शास्त्रीय सिद्धांतों को प्रवचन, साहित्य, टी. वी. के माध्यम से एवं प्रचारकों को शिक्षित करके देश-विदेश में भेजकर उनके द्वारा जनसाधारण तक पहुँचाकर, सम्पूर्ण विश्व का महान् उपकार करने वाले करुणावतार श्री कृपालु गुरुदेव के कोमल चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम...!!!

ब्रजधाम के एक साधु श्री का श्री महाराजजी के लिए उदगार...!!!
"कृपालु जी महाराज तो साक्षात् राधारानी हैं, वे तो अवढरदानी हैं। उन जैसा अवढरदानी, महान् दाता पृथ्वी पर दूसरा कोई नहीं हो सकता। उन्होंने तो सदा से लुटाया ही लुटाया है, लूटने वालों ने खूब लूटा और न लूटने वालों ने कुछ नहीं लूटा, वे चूक गये..... !"


यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान।

शीश दियो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान।।


जय श्री राधे।
ये मन दुश्मन है, इससे सदा सावधान रहो। मन को सदा हरि-गुरु के चिंतन में लगाये रहो तो मन शुद्ध होगा। भगवान कहते हैं सदा सर्वत्र मेरा स्मरण करते रहो ताकि मरते समय मेरा स्मरण हो और तुम्हें मेरा लोक मिले,मेरी सेवा मिले।

------ जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।

मन एवं सांसारिक पदार्थ सजातीय होने के कारण एक दूसरे के सहयोगी हैं।

----श्री महाराजजी।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...