Friday, November 25, 2016

ये मन दुश्मन है, इससे सदा सावधान रहो। मन को सदा हरि-गुरु के चिंतन में लगाये रहो तो मन शुद्ध होगा। भगवान कहते हैं सदा सर्वत्र मेरा स्मरण करते रहो ताकि मरते समय मेरा स्मरण हो और तुम्हें मेरा लोक मिले,मेरी सेवा मिले।
------ जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।

Saturday, November 19, 2016

यहाँ पर एक प्रश्न यह भी उत्पन्न होता है कि यदि भगवान् सर्वव्यापक है तो फिर उसका हमें अनुभव क्यों नहीं होता। रसगुल्ला खाते हैं, चीनी खाते हैं तो हमें उसकी मिठास का अनुभव होता है फिर प्रत्येक परमाणु में व्याप्त आनन्दमय भगवान् के आनन्द का हमें अनुभव क्यों नहीं होता ? दूध पीने में दूध का अनुभव होता है, विष खाने में विष का अनुभव होता है, उसी प्रकार भगवान् का भी अनुभव हमें होना चाहिये। आप लोगों का दावा है कि अनुभव में आने वाली वस्तु ही आप मान सकते हैं। अनुभव प्रमाण ही आपको मान्य है। किन्तु अनुभव प्रमाण सबसे निर्बल प्रमाण है। पीलिया रोग के रोगी को सर्वत्र पीला ही पीला दीखता है किन्तु उसका अनुभव भ्रामक है। साँप के काटे हुए व्यक्ति को नीम मीठा लगता है। इसी प्रकार भव-रोग से ग्रस्त जीव को किसी भी वस्तु का अनुभव भ्रामक ही होता है। एक चींटी चीनी के पहाड़ पर चक्कर काटकर लौटी और उससे पूछा गया तो उसने अनुभव यह बताया कि यह पर्वत नमकीन था। बड़ा आश्चर्य हुआ किन्तु जब जाँच हुई तो पता चला कि चींटी के मुख में नमक की डली रखी हुई थी। अस्तु, सर्वत्र शक्कर के ढेर पर भ्रमण करते हुए भी उसे अपने मुख में रखे हुए नमक का ही स्वाद अनुभव में आया। उसी प्रकार जिस इन्द्रिय, मन, बुद्धि से हम संसार को ग्रहण करते हैं वे सब प्राकृत, मायिक, त्रिगुणात्मक एवं सदोष हैं और भगवान् प्रकृत्यतीत, दिव्य, गुणातीत एवं दोषरहित है, फिर हम इनसे उसके ठीक स्वरूप को किस प्रकार से पहचान सकते हैं ? जब तक ये दिव्य न हो जायें, इनका अनुभव सही कदापि नहीं हो सकता।
प्रेम रस सिद्धान्त,
रचयिता- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
संस्करण 2010, अध्याय 1: जीव का चरम लक्ष्य, पृ. 26
<ईश्वर सर्वव्यापक है>
कुछ लोग कहते हैं कि घड़ी अपने आप चलती है ऐसे ही सृष्टि भी अपने आप हो जायगी, किन्तु उन्हें सोचना चाहिये कि घड़ी पूर्व में नहीं चलती थी जब किसी ने उसे बनाया तब चलने लगी एवं पश्चात् भी नहीं चलेगी अर्थात् नष्ट हो जायगी, तब फिर बनानी पड़ेगी। इसके अतिरिक्त यह भी विचारणीय है कि घड़ी बनाने वाले ने घड़ी तो बनायी है किन्तु उस घड़ी के लौह परमाणुओं की क्रिया को घड़ीसाज नहीं जानता अर्थात् उस पर कन्ट्रोल नहीं कर सकता। उसे कन्ट्रोल करने वाला ईश्वर है। अतएव ईश्वर को सर्वव्यापक होना पड़ता है अन्यथा वे परमाणु ठीक रूप से काम नहीं कर सकते।
प्रेम रस सिद्धान्त,
रचयिता- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
संस्करण 2010, अध्याय 1: जीव का चरम लक्ष्य, पृ. 17

भावार्थः- भगवान् संसार की रचना करते हैं, उसका पालन करते हैं और अंत में उसका प्रलय कर देते हैं अर्थात् यह सम्पूर्ण संसार ईश्वर से प्रकट हुआ है, ईश्वर द्वारा इसका पालन किया जाता है और अंत में फिर यह सम्पूर्ण संसार ईश्वर में समा जाता है। संसार का नियामक ईश्वर है। इस संसार के प्रत्येक परमाणु में ईश्वर व्याप्त है, अतः ईश्वर सर्वव्यापक है। सृष्टि का पालन एवं उसकी रक्षा करने के लिये भगवान् संसार के प्रत्येक परमाणु में व्याप्त होते हैं।
------ जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj entire life was dedicated to inspiring souls on the path of devotion to God. Through enlightening discourses and chanting of the holy name, Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj (lovingly called Shri Maharaj Ji by His devotees) made unceasing efforts to reveal the true philosophy from the Vedic scriptures to mankind in the simplest form possible so that they may attain their true goal of God Realisation. Mankind was privileged to have his physical association on this planet earth from 1922 to 2013.
His natural scholarliness inspired trust in even the greatest intellectuals, while his tremendous love, causeless grace and endless compassion melted the hearts and inspired devotional love in all who came near him. His satsang was divinely exhilarating and unbelievably joyous.
मेरे प्रिय साधक!
भगवान एवं गुरु सदा सर्वदा हैं ऐसा ही मानो। लीला संवरण की बात कभी न सोचो।
मैं सदा शरणागत के पास रहूँगा।

'कृपालु'

गुरु हमारे अत्यन्त निकट हैं, दिन - रात हमारे साथ रहते हैं। उनका विछोह अथवा वियोग कभी होता ही नहीं।
----श्री महाराज जी।
प्रिय साधक मित्रों...!!!
श्री महाराजजी के समस्त सत्संगी जनवरी में वृन्दावन पहुँचिये।और प्रेम मंदिर प्रांगण में इस दिव्य 'जगद्गुरुत्तम दिवस महोत्सव' का आनंद लीजिये। volunteers की भी बहुत अधिक संख्या में सेवा कार्यों में आवश्यकता होगी, इसलिए सभी से विनती है की अवश्य वृन्दावन आइये।
जय श्री राधे।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...