Thursday, January 19, 2017

★जगद्गुरुत्तम-मुखारविन्द-बिन्दु★
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हम उन लोगो को सबसे अधिक अभागा/भाग्यहीन समझते हैं जो वृद्धावस्था आने पर भी भगवद्भजन की ओर प्रवृत्त नही होते और अपने नाती-पोतों के लालन-पालन (अनावश्यक अपनी संतान की गृहस्थी में) में ही उलझे रहते हैं ।
हम कहते हैं कि अरे ! तुमने अपने बच्चो की परवरिश कर दी उनको पढ़ा-लिखा कर अपनी duty पूरी कर दी, बात खत्म ! लेकिन नही मानते !!
शायद ठान लिया हैं कि इस अनमोल मानव-जीवन को बर्बाद करके ही छोड़ेंगे !!!

-----जगद्गुरु श्रीकृपालु महाप्रभु।
[श्रीमहाराज जी तथा सत्संगियो के मध्य हुई जनरल वार्तालाप से संकलित]
★★★★राधे राधे★★★★
मानव देह तो कभी-कभी मिलता है। लाखों वर्षों के बाद, बाकी योनियाँ मिला करती हैं। कुत्ते बने, गधे बने, बिल्ली बने, मच्छर बने, दुःख भोगे मर गये, फिर दुःख भोगे फिर मर गये। लेकिन कर्म करने का अधिकार और योनियों में नहीं है, स्वर्ग में भी नहीं है। - वहाँ भी भोग है, जैसे कुत्ता-बिल्ली ये भोग योनि है। ऐसे ही स्वर्ग के देवता भी हैं। वहाँ भी कर्म नहीं हो सकता, भक्ति नहीं हो सकती। केवल मानव देह में मनुष्य शरीर, जिसको हम विषय सेवन में बिता देते हैं अथवा खा - पीकर किसी प्रकार। बेटे से कहते हैं- बेटा मेरी तो बीत गई अब तुम अपनी फ़िक्र करो। पिता जी आपकी क्या बीत गई, देखो अब सत्तर के हो गये, अस्सी के हो गये, नब्बे के हो गये। पिता जी ! तो इसके बाद फिर क्या होगा ? भगवान् को प्यारे हो जायेंगे। भगवान् के प्यारे ऐसे हो जाओगे- साधना तो किया नहीं पूरे जीवन भर बेटे की साधना की, बाप की, माँ की, बीबी की, पति की, इनकी भक्ति की और मरने के बाद क्या आशा कर रहे हो गोलोक, बैकुण्ठ मिलेगा। जिसमें प्यार होता है मरने के बाद उसी की प्राप्ति होती है। यदि तुम हरि गुरु से प्यार करते हो तो उनका लोक मिलेगा और यदि तुम बाप, बेटे, माँ, पति, बीबी, इनसे प्यार करते हो तो ये कुत्ता , बिल्ली , गधा बनेंगे तो तुमको भी वही योनि मिलेगी। बड़ी सीधी सी बात है।
----- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
मन में निश्चय करो की हमारा लक्ष्य हरि-गुरु सेवा ही रहे, हम उन्हीं के लिए ही सब काम करें, उन्हीं के लिए ही जियें और अंत में हरि-गुरु का स्मरण करते हुए ही इस नश्वर शरीर को त्याग कर भगवान के श्रीचरणों में चलें जाएँ ।
जय श्री राधे।



श्री महाराजजी से प्रश्न : महाराज जी क्या आप दीक्षा देते हैं ?
श्री महाराजजी द्वारा उत्तर: देते हैं । अधिकारी को देते हैं। दीक्षा माने समझते हो ? दीक्षा माने दिव्य प्रेम । वो दिव्य प्रेम पाने के लिये दिव्य बर्तन चाहिए। यानि दिव्य अन्तःकरण । ये अंतःकरण जो है, ये मायिक है, प्राकृत है, ये दिव्य प्रेम को सहन नहीं कर सकता। किसी भिखारी की एक करोड़ की लाटरी खुल जाती है तो हार्टफेल हो जाता है उसका। तो अनन्त आनन्दयुक्त जो प्रेम है, वह प्राकृत अन्तःकरण में नहीं समा सकता। तो पहले अन्तःकरण शुद्धि करनी होगी।
ये बाबा लोग आजकल जो ठगते हैं लोगों को कान फूँक- फूँक करके, ये सब वेद विरुद्ध है। ये पाप कर रहे हैं, उनको सबको नरक मिलेगा, हजारों- लाखों वर्ष का। और ये जो कान फुँकाते हैं, इन मूर्खों को इतनी समझ नहीं है कि गुरु जी से पूँछे कि आप क्या दे रहे हैं ? मंत्र ! ये मन्त्र का क्या मतलब है ? हरेक मंत्र का यह अर्थ है कि हे भगवान् ! आपको नमस्कार है । वो अगर हिन्दी में कहें , उर्दू में कहें, पंजाबी , बंगाली , मद्रासी में कहें , तो भगवान् खुश नहीं होंगे ? और फिर अगर तुम कहते हो हमारे मंत्र में पॉवर है, तो तुमने जब कान में दिया तो उस पॉवर की फीलिंग क्यों नहीं हुई। मामूली से करेन्ट को छूने से तो सारा शरीर काँप जाता है और तुम स्प्रिचुअल हैप्पीनेस दिव्यानन्द दे रहे हो कान में, और हमको कोई फीलिंग नहीं। हमारी हालत और फटीचर होती जा रही है । और कान फुँकाये बैठे हैं। तो फिर तुमने क्या दिया ? ये सब धोखा है। पहले भक्ति करनी होगी। जब अन्तःकरण शुद्ध हो जायगा, तब गुरु एक पॉवर देगा, तब अन्तःकरण दिव्य बन जायगा , तब भगवत्प्रेम मिलेगा फिर भगवत्प्राप्ति, माया निवृत्ति , सब इकठ्ठा काम खत्म ।
अरे तमाम मंत्र तो लिखे हैं , पुस्तकों में, वो कान में क्या दे रहे हैं ? हजारों मंत्र शास्त्रों में, भागवत वगैरह सबमे लिखे हैं, कोई भी पढ़े अपना जपे, उससे क्या होगा ?

------ जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज के श्रीमुख से:
मेरे प्रिय साधक,
तत्वज्ञान तो इतना ही है कि सेवक धर्म में केवल सेव्य की इच्छानुसार सेवा करना है। किन्तु अभ्यास एवं वैराग्य से ही सेवा का सही रूप बनेगा। अभ्यास यह है कि क्षण क्षण सावधान रहो। वैराग्य यह कि शरीर के सुखों की इच्छा न हो। स्टेशन मास्टर या कारखाने का कर्मचारी रात भर नही सोता। बीमार शिशु की माँ रात भर नहीं सोती। यह महत्व मानने पर निर्भर करता है। लापरवाही ही अनंत जन्म नष्ट कर चुकी है। अतः तत्वज्ञानी को परवाह करनी चाहिए। यह सौभाग्य सदा न मिलेगा। जब तक मिला है परवाह करके लाभ ले लें।
दान का महत्व.....!!!!!
कोई व्यक्ति बैंक में पैसा जमा करता है तो ये नहीं सोचता कि पैसा जा रहा है । बल्कि ये सोचता है,
२ लाख हो गया बैंक में, 4 लाख हो गया अब तो! जेब में नहीं है, लेकिन बैंक में जमा हो रहा है ।
ऐसे ही पारमार्थिक दान करते समय ये सोचना चाहिए कि ये कई गुना होके मिलेगा अगले जन्म में ।
इसलिए दान करते समय ये मत सोचा कीजिये कि ये पैसा जा रहा है जेब से ।

सोचते हैं 99.99% लोग सोचते हैं ।
----- जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।

Philosophy of Divine Love by Shri Maharaj Ji has been presented by Badi Didi in The Speaking Tree part of Times of India (TOI) - 15 January 2017


Friday, December 23, 2016

जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ने अपने दिव्य प्रवचनों के द्वारा समस्त वेदों - शास्त्रों के वास्तविक रहस्यों को अत्यंत सरल और सारगर्भित शैली में उद्घाटित किया है । वास्तव में श्री महाराजजी का दिव्य अवतरण इस कलिकाल में इसीलिए हुआ है क्योंकि विभिन्न मत और सम्प्रदायों ने अपने अपने मतानुसार शास्त्रों वेदों की अनेक परस्पर विरोधी व्याख्याएं करके साधारण आस्तिक जनता को भ्रमित ही करने का कार्य किया है ।भक्ति का वास्तविक स्वरूप ,कर्म -धर्म ,ज्ञानयोग और मोक्ष आदि की जो अनेकानेक परस्पर विरोधी व्याख्याएं की गई हैं ,श्री महाराज जी ने सभी का समन्वय करके एक मात्र 'भक्तिमार्ग' की ही श्रेष्ठता प्रतिपादित की है । इसी योग्यता के कारण श्री महाराजजी को "निखिल दर्शन समन्वयाचार्य " की उपाधि से अलंकृत किया गया ।
समस्त शास्त्र -वेदों का अर्थ इतने विशद रूप में पहली बार पब्लिक के बीच में उनकी ही सरल भाषा में श्री महाराजजी ने सहज ही प्रकट किया है ।
इसके बावजूद भी कुछ तथाकथित सम्प्रदायवादियों को आपत्ति है कि श्री महाराज जी ने पूर्व वर्ती जगद्गुरुओं की भांति ब्रह्म सूत्र ,उपनिषदों तथा श्रीमदभगवद्गीता आदि का भाष्य नहीं किया ।
श्री महाराज जी द्वारा जो दिव्यातिदिव्य तत्वज्ञान अपने अनगिनत प्रवचनों के माध्यम से जन साधारण को प्रदान किया गया वह क्या किसी भी भाष्य से कम है ।अनेकानेक पद संकीर्तन आदि चलते फिरते ही श्री महाराजजी ने सहज ही भावावेश की अवस्था में प्रकट किये हैं उनमे जो अनुभूति की तीव्रता है जो सरसता है जो विलक्षणता है उस रस की तुलना क्या किसी भाष्य से हो सकती है ?
श्री महाराज जी ने अपनी दिव्य वाणी के द्वारा जिन शास्त्र वेदों के निगूढतम सिद्धांतों को प्रकट किया है उनका स्थान कोई भी भाष्य नही ले सकता ।
स्वयं वेद व्यास जी ने श्रीमद्भागवत के विषय में लिखा -'अर्थोsयं ब्रह्म सूत्राणाम्' ।।
फिर ब्रह्म सूत्रों पर अन्य किसी भाष्य की क्या आवश्यकता है ।श्री महाराजजी ने अनेक बार इस तथ्य को अपने प्रवचनों में उल्लिखित किया है ।
प्रत्येक महापुरुष का प्राकट्य देश काल तथा युग धर्म की परिस्थतियो के अनुकूल होता है ।पूर्व वर्ती जगद्गुरुओ ने तमाम भाष्य लिखे वह उस युग के अनुकूल रहा होगा लेकिन क्या वर्तमान काल में उस शैली के संस्कृत भाष्य, तत्व जिज्ञासु लोगो को कुछ लाभ दे पायेंगे। वे तो बस पोथियो की ही शोभा बढ़ाएंगे ।
दूसरी बात है 'परम्परा और सम्प्रदाय' की श्री महाराजजी ने अनेको बार इस बात को दोहराया है कि दो ही सम्प्रदाय हैं -एक माया का यह 'भौतिकतावादी सम्प्रदाय' जिसमे फंसा हुआ जीव अनादि काल से ठोकरे खा रहा है और दूसरा है 'भगवदीय सम्प्रदाय' । इसी को कठोपनिषद में "प्रेय मार्ग और श्रेय मार्ग" कहा गया है - "अन्य च्छ्रेयोsयुदुतैव प्रेयस्ते नानार्भे पुरुषं सिनीत:॥
तयो श्रेय आददानस्य साधु भवति दीयतेsर्थाद्य प्रेयो वृणीते"।।
कबीर ने भी कितना सुन्दर कहा है -
'पखा पखी के कारने सब जग रहा भुलान निरपख हो के हरि भजे सोई संत सुजान' ।।
अर्थात पक्ष विपक्ष मत मतांतरों और सम्प्रदायो के झगड़ो में सारा जगत उलझा हुआ है । जो इन झगड़ो से परे रहकर अनन्य भाव से हरि का भजन करता है वही वास्तविक संत होता है ।
तो हमारे श्री महाराजजी ऐसे ही निरपख संत सुजान हैं ।। वे किसी बाहरी दिखावे या बंधन के आधीन नहीं है । उन्होंने तो जीवन पर्यन्त मुक्त हस्त से हम कलिमल ग्रसित अधम जीवों पर अपनी करुणा और कृपा की निरंतर वर्षा की है और आज भी हम सबके हृदय में बसे हुए हैं । सूर्य के तेज को कोई डिबिया में बंद नहीं कर सकता ऐसे ही श्री महाराजजी के दिव्य व्यक्तित्व और कृतित्व को कोई किसी उपाधि परम्परा या सम्प्रदाय में नहीं समेट सकता।

।।राधे -राधे ।।
श्रीमद्सद्गुरु सरकार की जय।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...