This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Thursday, January 19, 2017
A Tribute to Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj:
Leaving for his divine abode, the most revered Kripalu Ji Maharaj, has left a void in the spiritual life of this world which cannot be filled. Being such a noble personality and having attained the highest form of jnana and bhakti, the whole world was suffused with the sweet stream of Shri Radha Krishna's divine love. He revealed a tangible form of meditation or dhyana and renamed it rupadhyana, thereby making it clear that the practice of meditation is meaningful only when we choose a visual form of God and focus our mind on that form while meditating.
Leaving for his divine abode, the most revered Kripalu Ji Maharaj, has left a void in the spiritual life of this world which cannot be filled. Being such a noble personality and having attained the highest form of jnana and bhakti, the whole world was suffused with the sweet stream of Shri Radha Krishna's divine love. He revealed a tangible form of meditation or dhyana and renamed it rupadhyana, thereby making it clear that the practice of meditation is meaningful only when we choose a visual form of God and focus our mind on that form while meditating.
I feel that as Jagadguruttam the way he liberally showered the
sweetness of Shri Radha Krishna's divine love on the people of the world
was simply amazing. Receiving God's grace is a great privilege, but
even greater than that, is to spread it to each and every individual.
Shri Kripalu Ji Maharaj revealed with great devotion the gangotri of
scriptural knowledge from the land of Vrindavan, which over the course
of time, quenched the spiritual thirst of the entire world.
Although today he is not physically present in our midst, he will continue to exist among millions of his devotees across the world with his spiritual effulgence. Today, on the occasion of immersion of the kalash containing his holy ashes, I, on my own behalf and that of the entire Vatsalya Parivar, bow to his all-pervading divinity and pay tribute to him.
Sadhvi Ritambhara Ji
Adhishthatri,
Vatsalya Gram, Vrindavan.
Although today he is not physically present in our midst, he will continue to exist among millions of his devotees across the world with his spiritual effulgence. Today, on the occasion of immersion of the kalash containing his holy ashes, I, on my own behalf and that of the entire Vatsalya Parivar, bow to his all-pervading divinity and pay tribute to him.
Sadhvi Ritambhara Ji
Adhishthatri,
Vatsalya Gram, Vrindavan.
★जगद्गुरुत्तम-मुखारविन्द-बिन्दु★
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हम उन लोगो को सबसे अधिक अभागा/भाग्यहीन समझते हैं जो वृद्धावस्था आने पर भी भगवद्भजन की ओर प्रवृत्त नही होते और अपने नाती-पोतों के लालन-पालन (अनावश्यक अपनी संतान की गृहस्थी में) में ही उलझे रहते हैं ।
हम कहते हैं कि अरे ! तुमने अपने बच्चो की परवरिश कर दी उनको पढ़ा-लिखा कर अपनी duty पूरी कर दी, बात खत्म ! लेकिन नही मानते !!
शायद ठान लिया हैं कि इस अनमोल मानव-जीवन को बर्बाद करके ही छोड़ेंगे !!!
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हम उन लोगो को सबसे अधिक अभागा/भाग्यहीन समझते हैं जो वृद्धावस्था आने पर भी भगवद्भजन की ओर प्रवृत्त नही होते और अपने नाती-पोतों के लालन-पालन (अनावश्यक अपनी संतान की गृहस्थी में) में ही उलझे रहते हैं ।
हम कहते हैं कि अरे ! तुमने अपने बच्चो की परवरिश कर दी उनको पढ़ा-लिखा कर अपनी duty पूरी कर दी, बात खत्म ! लेकिन नही मानते !!
शायद ठान लिया हैं कि इस अनमोल मानव-जीवन को बर्बाद करके ही छोड़ेंगे !!!
-----जगद्गुरु श्रीकृपालु महाप्रभु।
[श्रीमहाराज जी तथा सत्संगियो के मध्य हुई जनरल वार्तालाप से संकलित]
★★★★राधे राधे★★★★
[श्रीमहाराज जी तथा सत्संगियो के मध्य हुई जनरल वार्तालाप से संकलित]
★★★★राधे राधे★★★★
मानव
देह तो कभी-कभी मिलता है। लाखों वर्षों के बाद, बाकी योनियाँ मिला करती
हैं। कुत्ते बने, गधे बने, बिल्ली बने, मच्छर बने, दुःख भोगे मर गये, फिर
दुःख भोगे फिर मर गये। लेकिन कर्म करने का अधिकार और योनियों में नहीं है,
स्वर्ग में भी नहीं है। - वहाँ भी भोग है, जैसे कुत्ता-बिल्ली ये भोग योनि
है। ऐसे ही स्वर्ग के देवता भी हैं। वहाँ भी कर्म नहीं हो सकता, भक्ति नहीं
हो सकती। केवल मानव देह में मनुष्य शरीर, जिसको हम विषय सेवन में बिता
देते हैं अथवा खा - पीकर किसी प्रकार। बेटे से कहते हैं-
बेटा मेरी तो बीत गई अब तुम अपनी फ़िक्र करो। पिता जी आपकी क्या बीत गई,
देखो अब सत्तर के हो गये, अस्सी के हो गये, नब्बे के हो गये। पिता जी ! तो
इसके बाद फिर क्या होगा ? भगवान् को प्यारे हो जायेंगे। भगवान् के प्यारे
ऐसे हो जाओगे- साधना तो किया नहीं पूरे जीवन भर बेटे की साधना की, बाप की,
माँ की, बीबी की, पति की, इनकी भक्ति की और मरने के बाद क्या आशा कर रहे हो
गोलोक, बैकुण्ठ मिलेगा। जिसमें प्यार होता है मरने के बाद उसी की प्राप्ति
होती है। यदि तुम हरि गुरु से प्यार करते हो तो उनका लोक मिलेगा और यदि
तुम बाप, बेटे, माँ, पति, बीबी, इनसे प्यार करते हो तो ये कुत्ता , बिल्ली ,
गधा बनेंगे तो तुमको भी वही योनि मिलेगी। बड़ी सीधी सी बात है।
----- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
श्री महाराजजी से प्रश्न : महाराज जी क्या आप दीक्षा देते हैं ?
श्री महाराजजी द्वारा उत्तर: देते हैं । अधिकारी को देते हैं। दीक्षा माने समझते हो ? दीक्षा माने दिव्य प्रेम । वो दिव्य प्रेम पाने के लिये दिव्य बर्तन चाहिए। यानि दिव्य अन्तःकरण । ये अंतःकरण जो है, ये मायिक है, प्राकृत है, ये दिव्य प्रेम को सहन नहीं कर सकता। किसी भिखारी की एक करोड़ की लाटरी खुल जाती है तो हार्टफेल हो जाता है उसका। तो अनन्त आनन्दयुक्त जो प्रेम है, वह प्राकृत अन्तःकरण में नहीं समा सकता। तो पहले अन्तःकरण शुद्धि करनी होगी।
श्री महाराजजी द्वारा उत्तर: देते हैं । अधिकारी को देते हैं। दीक्षा माने समझते हो ? दीक्षा माने दिव्य प्रेम । वो दिव्य प्रेम पाने के लिये दिव्य बर्तन चाहिए। यानि दिव्य अन्तःकरण । ये अंतःकरण जो है, ये मायिक है, प्राकृत है, ये दिव्य प्रेम को सहन नहीं कर सकता। किसी भिखारी की एक करोड़ की लाटरी खुल जाती है तो हार्टफेल हो जाता है उसका। तो अनन्त आनन्दयुक्त जो प्रेम है, वह प्राकृत अन्तःकरण में नहीं समा सकता। तो पहले अन्तःकरण शुद्धि करनी होगी।
ये बाबा लोग आजकल जो ठगते हैं लोगों को कान फूँक- फूँक करके, ये सब वेद
विरुद्ध है। ये पाप कर रहे हैं, उनको सबको नरक मिलेगा, हजारों- लाखों वर्ष
का। और ये जो कान फुँकाते हैं, इन मूर्खों को इतनी समझ नहीं है कि गुरु जी
से पूँछे कि आप क्या दे रहे हैं ? मंत्र ! ये मन्त्र का क्या मतलब है ?
हरेक मंत्र का यह अर्थ है कि हे भगवान् ! आपको नमस्कार है । वो अगर हिन्दी
में कहें , उर्दू में कहें, पंजाबी , बंगाली , मद्रासी में कहें , तो
भगवान् खुश नहीं होंगे ? और फिर अगर तुम कहते हो हमारे मंत्र में पॉवर है,
तो तुमने जब कान में दिया तो उस पॉवर की फीलिंग क्यों नहीं हुई। मामूली से
करेन्ट को छूने से तो सारा शरीर काँप जाता है और तुम स्प्रिचुअल हैप्पीनेस
दिव्यानन्द दे रहे हो कान में, और हमको कोई फीलिंग नहीं। हमारी हालत और
फटीचर होती जा रही है । और कान फुँकाये बैठे हैं। तो फिर तुमने क्या दिया ?
ये सब धोखा है। पहले भक्ति करनी होगी। जब अन्तःकरण शुद्ध हो जायगा, तब
गुरु एक पॉवर देगा, तब अन्तःकरण दिव्य बन जायगा , तब भगवत्प्रेम मिलेगा फिर
भगवत्प्राप्ति, माया निवृत्ति , सब इकठ्ठा काम खत्म ।
अरे तमाम मंत्र तो लिखे हैं , पुस्तकों में, वो कान में क्या दे रहे हैं ? हजारों मंत्र शास्त्रों में, भागवत वगैरह सबमे लिखे हैं, कोई भी पढ़े अपना जपे, उससे क्या होगा ?
------ जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
अरे तमाम मंत्र तो लिखे हैं , पुस्तकों में, वो कान में क्या दे रहे हैं ? हजारों मंत्र शास्त्रों में, भागवत वगैरह सबमे लिखे हैं, कोई भी पढ़े अपना जपे, उससे क्या होगा ?
------ जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
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ए # मनुष्यों ! # मानव_देह प्राप्त हुआ है , # भगवतप्राप्ति के लिये केवल, इसकाे मत गँवाओ, व्यर्थ # भाेग_विलास में केवल लिप्त रह कर...






