This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Monday, April 10, 2017
संसार
के कार्य करते हुए भी बीच-बीच में बारंबार 'भगवान मेरे सामने हैं' इस
प्रकार रूपध्यान द्वारा निश्चय करते रहना चाहिये। इससे दो लाभ हैं - एक तो
रूपध्यान परिपक्व होगा, दूसरे हम, भगवान को अपने समक्ष, साक्षात रूप से
महसूस करते हुए उच्छृंक्ल न हो सकेंगे, जिसके परिणाम स्वरूप अपराधों से बचे
रहेंगे। जीव तो, किंचित भी स्वतंत्र हुआ कि बस, वह धारा-प्रवाह रूप से
संसार की ही ओर भागने लगेगा।
------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
गुरु मेटत अँधियार .....!!!
गुरु अपने अनुगत के लिए सदा कृपालु होता है,किन्तु कृष्ण प्राप्ति हेतु लालसा बनाए रखने की पात्रता अनिवार्य है। पात्रता का तात्पर्य शरणागति से है। निष्काम भाव से गुरु की शरणागति करने से वह महापुरुष अनुगत साधक के अंत:करण की भूमि को उर्वरक बना उसमें ईश्वर भक्ति का बीज बोता है। गुरु कृपा पाने की शर्त यह है की साधक की गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा एवं दृढ़ निष्ठा हो। विपरीत से विपरीत परिस्थिति में उसकी गुरु भक्ति निष्कंप और निश्चल रहे। तभी शिष्य की चेतना गुरु की चेतना से एकाकार हो सकती है,उसकी वत्सलता और कृपा को अनुभूत कर सकती है। गुरु अनुगत के अंत:करण की निर्मलता को नहीं देखता बल्कि उसका समर्पण देखता है और हरी की गोद उपलब्ध करवा देता है।
गुरु माता शिशु मन गोविंद राधे। विमल बना के हरि गोद बैठा दे।।
अत: गुरु की महिमा का बखान असंभव है;शब्दातीत है।
काम ,क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या,द्वेष, अहंकार आदि मन के शत्रु घटाटोप की तरह मन को आछादित किए रहते हैं। ऐसे भीषण शत्रुओं से घिरे मन की स्थिति के प्रति उसके कृपालु मन में भाव- संवेदनाओं की अजस्र धार फूट पड़ती है और वह अपने अनुगत के अंत:करण के मल का अनवरत प्रक्षालन करता रहता है। गुरु के हर व्यवहार,हर कार्य का विशिष्ट अर्थ होता है,भले ही वह ऊपरी तौर पर कितना भी निरर्थक क्यों न लगे। हमें उसकी किसी बात की अवहेलना नहीं करनी चाहिए,बल्कि अटूट श्रद्धा रखनी चाहिए क्योंकि गुरु के रूठ जाने पर जीव के कल्याण का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। गुरु आज्ञापालन और सेवा ही जीव को ईश्वर तक पहुंचाने का मूल मंत्र है। गुरु सेवा का अर्थ है- गुरु जो भी कहे,जैसा भी काम सौंपे,करना है।
गुरु अपने अनुगत के लिए सदा कृपालु होता है,किन्तु कृष्ण प्राप्ति हेतु लालसा बनाए रखने की पात्रता अनिवार्य है। पात्रता का तात्पर्य शरणागति से है। निष्काम भाव से गुरु की शरणागति करने से वह महापुरुष अनुगत साधक के अंत:करण की भूमि को उर्वरक बना उसमें ईश्वर भक्ति का बीज बोता है। गुरु कृपा पाने की शर्त यह है की साधक की गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा एवं दृढ़ निष्ठा हो। विपरीत से विपरीत परिस्थिति में उसकी गुरु भक्ति निष्कंप और निश्चल रहे। तभी शिष्य की चेतना गुरु की चेतना से एकाकार हो सकती है,उसकी वत्सलता और कृपा को अनुभूत कर सकती है। गुरु अनुगत के अंत:करण की निर्मलता को नहीं देखता बल्कि उसका समर्पण देखता है और हरी की गोद उपलब्ध करवा देता है।
गुरु माता शिशु मन गोविंद राधे। विमल बना के हरि गोद बैठा दे।।
अत: गुरु की महिमा का बखान असंभव है;शब्दातीत है।
काम ,क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या,द्वेष, अहंकार आदि मन के शत्रु घटाटोप की तरह मन को आछादित किए रहते हैं। ऐसे भीषण शत्रुओं से घिरे मन की स्थिति के प्रति उसके कृपालु मन में भाव- संवेदनाओं की अजस्र धार फूट पड़ती है और वह अपने अनुगत के अंत:करण के मल का अनवरत प्रक्षालन करता रहता है। गुरु के हर व्यवहार,हर कार्य का विशिष्ट अर्थ होता है,भले ही वह ऊपरी तौर पर कितना भी निरर्थक क्यों न लगे। हमें उसकी किसी बात की अवहेलना नहीं करनी चाहिए,बल्कि अटूट श्रद्धा रखनी चाहिए क्योंकि गुरु के रूठ जाने पर जीव के कल्याण का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। गुरु आज्ञापालन और सेवा ही जीव को ईश्वर तक पहुंचाने का मूल मंत्र है। गुरु सेवा का अर्थ है- गुरु जो भी कहे,जैसा भी काम सौंपे,करना है।
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
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