Monday, November 13, 2017

बलिहार युगल सरकार, हमरिहुँ ओर निहार ।
तुम कर नित पर उपकार, हम मानत नहिँ आभार l
तुम मम 'कृपालु' आधार, हम जानत नाहिँ गमार।।

----- श्री महाराजजी।
'विरह' भक्ति का प्राण है। ताे 'वियाेग' ही जीवन है, यह रहस्य काेई जान ले और इन पाँचाें इन्द्रियाें की कामना श्यामसुन्दर की बना ले। तो बिगड़ी बन जायेगी।

------ जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
मानव होकर के हम निराशा का चिन्तन करें , इससे बड़ा कोई अपराध नहीं है , अविवेक नहीं है।

.......श्री महाराज जी।
वेद,कुरान,बाइबिल हर ग्रन्थ में एक ही बात लिखी है,जो संसारी वैभव विशेष पा लेगा,वह ईश्वर की ओर नहीं चल सकता। मेहनत से कमाया हुआ तो फ़िर भी एक बार को ज़मीन पर रहेगा जबकि वैसे उसका भी असंभव ही है पर जिसके पास (चार सौ बीसी) 420 करके मुफ़्तख़ोरी का पैसा है, गरीबों का लूट-लूट के जमा किया है, उसका तो ज़मीन पर टिके रहना सर्वथा असंभव है। वो बिना वज़ह ही उड़ा फिरेगा।
नहिं कोउ अस जनमा जग माहीं। प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं।।
श्रीमद वक्र न कीन्ह केहि प्रभुता बधिर न काहि।
इसलिए कुन्ती वर माँगती है हम को संसार के हर पदार्थ का अभाव दे दो। हमारे सारे जो रिश्तेदार हैं हमें गालियाँ दें,दुतकारें,फटकारें,अपमानित करें,और धन भी मत दो ताकि हमारे पीछे कोई लगे न।आप तो बड़े काबिल हैं सेठजी आप तो बड़े दानी हैं,आप तो दानवीर कर्ण हैं। ये जो चारों ओर से वाक्य सुनने को मिलते हैं सेठजी को,तो सेठजी सचमुच समझ लेते हैं,मैं कर्ण हो गया और जब पैसा खतम हो गया और सेठजी के पास कोई नहीं जाता बुलाने पर भी तब सेठजी की समझ में आता है कि सेठजी में कोई विशेषता नहीं थी। ये रुपये में विशेषता थी। 'पेड़ में फल लगे,चहकते हुए पक्षी आ गये बिना बुलाये।फल गिर गये,बिना कहे पक्षी उड़ गये' ठीक इसी प्रकार ये सारा संसार है।
---- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

कामना एवं प्रेम....!!!
कामना ' प्रेम ' का विरोधी तत्व है । लेने - देने का नाम व्यापार है । जिसमें प्रेमास्पद से कुछ याचना की भावना हो , वह प्रेम नहीं है । जिसमें सब कुछ देने पर भी तृप्ति न हो , वही प्रेम है । संसार में कोई व्यक्ति किसी से इसलिये प्रेम नहीं कर सकता क्योंकि प्रत्येक जीव स्वार्थी है वह आनन्द चाहता है , अस्तु लेने - लेने की भावना रखता है । जब दोनों पक्ष लेने- लेने की घात में हैं तो मैत्री कितने क्षण चलेगी ? तभी तो स्त्री - पति , बाप - बेटे में दिन में दस बार टक्कर हो जाती है । जहाँ दोनों लेने - लेने के चक्कर में हैं , वहाँ टक्कर होना स्वाभाविक ही है और जहाँ टक्कर हुई , वहीं वह नाटकीय स्वार्थजन्य प्रेम समाप्त हो जाता है । वास्तव में कामनायुक्त प्रेम प्रतिक्षण घटमान होता है ,जबकि - दिव्य प्रेम प्रतिक्षण वर्द्धमान होता है । कामना अन्धकार - स्वरुप है , प्रेम - प्रकाश स्वरुप है ।
-----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
'हरि , गुरु और भक्ति' इन तीनों में अनन्य भाव रखो । यानी इनके बाहर मत जाओ बस , राधाकृष्ण हमारे इष्ट देव और अमुक गुरु हमारा गाइड गार्जियन एक बस , और साधना - ये उपाय स्मरण , कीर्तन , श्रवण ये तीन बस इसके बाहर नहीं जाना है । कुछ न सुनना है , न समझना है न पढ़ना है । अगर कोई सुनावे , बस बस हमको मालुम है सब । निरर्थक बात नहीं सुनना है । बहुत से लोगों का यही धंधा है , कि इसको इस मार्ग से हटाओ । तो अण्ड बण्ड तर्क कुतर्क , वितर्क अतितर्क , ऐसी गन्दी गन्दी कल्पनाएँ करके आपके दिमांग में वो डाउट पैदा कर देंगे । तो सुनना नहीं है । बस अपने मतलब से मतलब । ये शरीर नश्वर है । पता नहीं कब छिन जाय । फालतू बातों में इसको न समाप्त करो , जल्दी जल्दी कमा लो । जितना अधिक भगवान् का , गुरु का स्मरण हो सके , उतना स्मरण करके अंतःकरण शुद्धि का १/४ कर लो । फिर अगले जन्म १/४ कर लेना । तो चार जन्म में हो जायगा शुद्ध । लेकिन जितना कर सको करो । उसमें लापरवाही नहीं करना है । और हरि गुरु को सदा अपने साथ मानो । अपने को अकेला कभी न मानो । इस बात पर बहुत ध्यान दो, इसका अभ्यास करना होगा थोडा । जैसे दस मिनट में आपने एक बार रियलाइज किया - हाँ श्यामसुन्दर बैठे हैं फिर अपना काम किया - तीन , चार , सात , पाँच , बारह , अठारह , चौबीस , फिर ऐसे आँख करके कि हाँ बैठे हैं । ये फीलिंग हो कि हम अकेले नहीं हैं हमारे साथ हमारा बाप भी है और हमारे गुरु भी हैं । ये फीलिंग हो तो अपराध नहीं होगा । गलती नहीं करेंगे , भगवान् का विस्मरण नहीं होगा । वह बार - बार पिंच करेंगे आकर के ।
तो इस प्रकार सदा उनको अपने साथ मानो और उनके मिलन की परम व्याकुलता बढ़ाओ ।

---- जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।

वास्तविक गुरु कभी संसारी वस्तु नहीं दिया करता....!!!

 आजकल बहुधा दम्भियों ने यही मार्ग अपना लिया है कि गृहस्थियों को संसार चाहिये ओर वो संस्कारवश मिलता ही रहता है, इसी में हम भी सम्मिलित हो जाये ओर अपनी स्वार्थ सिद्धि एवं ख्याति प्राप्त कर ले। सोचिये तो कि वह महापुरुष किसलिये है, इसलिये कि उसने संसार को नश्वर समझ कर भगवान को प्राप्त कर लिया है, दिव्यानंद प्राप्त कर चूका है।यदि वह हमे संसार देता है तो वह महापुरुष है या राक्षस है ? उसने तो अभी तक यही नहीं समझा है कि आनंद संसार में है या भगवान में। फिर वो महापुरुष कैसे ? और महापुरुष क्या भगवान भी कर्मविधान के विपरीत किसी को संसार नहीं देते। ऐसे ही हम बेहोश हैं, उस इश्वर को भूले हुये है जिसमें परमानन्द है, फिर महापुरुष वेशधारी ने संसार देने का नाटक करके हमें और गुमराह कर दिया।
जरा सोचिये, जिस अभिमन्यु के मामा परात्पर पूर्णतम पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण एवं जिनके पिता अर्जुन महापुरुष थे एवं जिसकी शादी कराने वाले वेदव्यास स्वयं भगवान के अवतार थे, जब तीन-तीन महाशक्तियाँ मिलकर भी उस अभिमन्यु को नहीं बचा सकी तब हम दिन रात अपराध करते हुये, इश्वर से विमुख रहते हुये, स्त्री, पुत्रादि में आसक्त रहते हुये कैसे आशा रखते हैं कि कोई बाबा हमारे प्रारब्ध को काट देगा ? हमारा यह दुर्भाग्य है कि हम लोग भारतीय शास्त्रों को नहीं पढ़ते अतएव इस प्रकार की महान त्रुटियाँ करते रहते हैं। प्रति वर्ष हमारे देश में ऐसा नाटक कहीं न कहीं विराट रूप में होता है और लाखों की भीड़ जमा हो जाति है, केवल इसलिये कि यह बाबा असंभव को संभव कर देता है। अगर ऐसा सामर्थ्य या अधिकार भगवान या किसी महापुरुष को होता तो अनादिकाल से अब तक अनंतानन्त बार भगवान एवं संतो के अवतीर्ण होने पर यह विश्व न बना रहता। जब वे संत लोग गाली एवं डंडा खाने को तैयार रहते हैं तब उन्हें यह कहने में क्या लगता है कि हे!समस्त विश्व के जीवों, तुम्हारा अभी ही तुरंत उद्धार हो जाये. बस, इतना कहने मात्र से काम बन जाये। भोले भाले लोगों को ठगने वाले ये दम्भी हमारे देश में निर्भयतापूर्वक विचरते हैं और आप लोग भी उनकी खोज में रहते हैं।
---- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...