Thursday, February 8, 2018

यह मनुष्य का शरीर बार–बार नहीं मिलता। दयामय भगवान् चौरासी लाख योनियों में भटकने के पश्चात् दया करके कभी मानव देह प्रदान करते हैं। मानव देह देने के पूर्व ही संसार के वास्तविक स्वरूप का परिचय कराने के लिए गर्भ में उल्टा टाँग कर मुख तक बाँध देते हैं। जब गर्भ में बालक के लिए कष्ट असह्य हो जाता है तब उसे ज्ञान देते हैं और वह प्रतिज्ञा करता है कि मुझे गर्भ से बाहर निकाल दीजिये, मैं केवल आपका ही भजन करूँगा । जन्म के पश्चात् जो श्यामसुन्दर को भूल जाता है, उसकी वर्तमान जीवन में भी गर्भस्थ अवस्था के समान ही दयनीय दशा हो जाती है। ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि यह मानव देह देवताओं के लिये भी दुर्लभ है, इसीलिये सावधान हो कर श्यामसुन्दर का स्मरण करो।
( प्रेम रस मदिरा:सिद्धान्त–माधुरी )
---जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
सर्वाधिकार सुरक्षित:- राधा गोविन्द समिति।
जगदगुरूत्तम श्री कृपालु जी महाराज के श्रीमुख से अमृत वचन:
जब संसारमात्र ही सदोष है,तो हम कहाँ तक दोष-चिन्तन करेंगे। यदि यह कहो कि क्या करें,दोष-दर्शन स्वभाव-सा बन गया,तो हमें कोई आपत्ति नहीं,तुम दोष देख सकते हो,किन्तु दूसरों के नहीं,अपने ही दोष क्या कम हैं। अपने दोषों को देखने में तुम्हारा स्वभाव भी न नष्ट होगा,तथा साथ ही एक महान् लाभ भी होगा। वह महान् लाभ तुलसी के शब्दों में- ' जाने ते छीजहिं कछु पापी' अर्थात् दोष जान लेने पर कुछ न कुछ बचाव हो जाता है,क्योंकि वह जीव उनसे बचने का कुछ न कुछ अवश्य प्रयत्न करता है।
----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
जगदगुरूत्तम श्री कृपालु जी महाराज के श्रीमुख से:
सत्य सिद्धान्त तो यह है कि जो स्वयं निंदनीय होता है वही दूसरों की निंदा करता है। परनिंदा करना ही स्वयं के निंदनीय होने का पक्का प्रमाण है। भगवान एवं उनके भक्तों की निंदा कभी भूल कर भी न सुननी चाहिए, न ही करनी चाहिए अन्यथा साधक का पतन निश्चित है, तथा उसकी सतप्रवर्तियाँ भी नष्ट हो जाती हैं। प्राय: अल्पज्ञ-साधक किसी महापुरुष की निंदा सुनने में बड़ा शौक रखता है। वह यह नहीं सोचता कि जो यह निंदा कर रहा है, भगवान की, या उनके जन की, इसका खुद का क्या स्तर है, अरे वो तो स्वयं निंदनीय है, जब तक स्वार्थ-पूर्ति होती रही उस निंदनीय व्यक्ति की, चुप-चाप स्वार्थ साधता रहा, किसी गलती पर बहुत सहने के बाद गुरु ने निकाल दिया तो अब निंदा करता फिरता है, आप खुद विचार कीजिये क्या वो महापुरुष है, जो किसी भगवदजन को समझ सकेगा, नहीं। सदा याद रखो कि संत निंदा सुनना नामापराध है। वास्तव में तो यही सब अपराध तो अनादिकाल से जीव को सर्वथा भगवान के उन्मुख ही नहीं होने देते। जिस प्रकार कोई पूरे वर्ष दूध, मलाई, रबड़ी, आदि खाये, एवं इसके पश्चात ही एक दिन विष खा ले, तथा मर जाये। अतएव बड़ी ही सावधानी पूर्वक सतर्क होकर हरि, हरि-जन-निंदा श्रवण से बचना चाहिए।

भक्ति मार्ग के साधक को हरि विमुखों का संग त्याग करना परमावश्यक है। यदि कोई धर्मात्मा व्यक्ति भी भक्ति का विरोध करता है तो उसका त्याग कर देना चाहिए क्योंकि कुसंग ग्रहण करने योग्य नहीं है।
----- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

कुसंग का प्रकरण बहुत लम्बा चौड़ा है वैसे,ये भी आप समझे रहिये कि तमाम किताबों का पढ़ना भी कुसंग है।
ये सब चीज़ें तो वह व्यक्ति करता है जिसको तत्वज्ञान न मिला हो। जिसको सही-सही बात का पता चल गया है,उसे किताबों के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिये कोई किताब नहीं पढ़ना है हमको।हमको तो अब करना है,हमको अब प्रैक्टिकल करना है।उससे लाभ होना है किताब को पढ़ करके कुछ नहीं पा सकते हम।
----- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

हम देखे श्यामलगात रे |
मधुर मधुर धुनि बेनु बजावत, गैयन पाछे जात रे |
काँधे कनक लकुटि कामरि अरु, पीतांबर फहरात रे |
चितवनि – चोट चलावत मुरि मुरि, मंद मंद मुसकात रे |
सँग धनसुख मनसुख श्रीदामा, अगनित सखन जमात रे |
झूमि ‘कृपालु’ चलत पुनि देखत, घूमि यशोमति मात रे ||

भावार्थ – एक सखी अपनी अंतरंग सखी के प्रश्न का उतर देती हुई कहती है कि हमने श्यामसुन्दर को देखा है | मधुर - मधुर मुरली बजाते हुए गायों के पीछे जा रहे थे | उनके कंधे पर सुवर्ण की लठिया एवं काली कामरी सुशोभित थी तथा पीताम्बर फहरा रहा था | वे मुड़ मुड़कर कटाक्षपात करते हुए देख रहे थे एवं मन्द – मन्द मुस्करा रहे थे | उनके संग में धनसुख, मनसुख, श्रीदामा आदि सहस्त्रों सखाओं का समूह था | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि श्यामसुन्दर झूमते हुए आ रहे थे एवं बार - बार घूम - घूमकर प्रेम के कारण यशोदा मैया को देखते जाते थे |
( प्रेम रस मदिरा श्रीकृष्ण – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति

गुरु आवश्यक है , गुरु किसे कहते हैं ?
जिसमें श्रीकृष्ण प्रेम हो , केवल लैक्चर दे , उससे काम नहीं चलेगा। भगवान् की प्राप्ति में केवल प्रेम देखा जायेगा।
रामही केवल प्रेम पियारा।
आप लोग जब पैदा हुये तो बोल नहीं सकते थे , माँ को पहचान भी नहीं सकते थे। भूख लगी - रो दिये। दर्द हुआ - रो दिये। बस ! बस वहीँ फिर पहुँचना होगा आपको एक दिन। इस जन्म में पहुँचो चाहें हजारों जन्मों में दुःख भोगने के पश्चात्। ये कृपालु का वाक्य आपको सदा याद रखना है - फिर भोले बालक बनना है , { भोला बालक }
गुरु के आदेश में जरा भी बुद्धि न लगाओ ; जैसे वाल्मीकि मरा - मरा कहता रहा , उसने न तो ये पूछा कि मरा - मरा कहने से क्या होगा ? और न ये पूछा आप कब लौटकर आयेंगे ? जो आज्ञा है उसका पालन करना है।
............जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...