Wednesday, October 3, 2018

दीनता भीतर रहे , और बहार से एक्टिंग में क्रोध का व्यवहार भी करना होगा। संसार में हर तरह का व्यवहार करना होगा लेकिन भीतर गड़बड़ न हो। भीतर दीनता , सहनशीलता , नम्रता यही गुण रहें और बाहर से जैसा व्यवहार बाहर वाला करे उसी का जवाब देना चाहिए। अब एक बदमाश घर में घुसे और उससे तुम कह दो कि आप कैसे पधारे ? नहीं , उसकी चप्पल से पिटाई करो , लेकिन भीतर से गड़बड़ न करो। ये मतलब है ! दीनता , नम्रता और सारे गुण अंतःकरण में रहने चाहिये और संसार के व्यवहार में सब तरह का व्यवहार करना चाहिए। जैसा पात्र हो वैसा व्यवहार करो। बच्चे का सुधार करना है , उसको डाँटना है , गुस्से की एक्टिंग करो , गुस्सा न करो। भीतर गड़बड़ न करो , बाहर से गड़बड़ की एक्टिंग करो। इतने मर्डर किये अर्जुन ने , हनुमान जी ने , प्रह्लाद वगैरह ने , भीतर गड़बड़ नहीं हुआ बाहर से सब एक्टिंग हो रही है। पिक्चर में जैसे प्यार की एक्टिंग करते हैं , दुश्मनी की एक्टिंग करते हैं , मारधाड़ करते हैं , वैसे ही मुँह बनाते हैं। लेकिन भीतर नहीं। वो तो पैसा कमाने को एक्टिंग कर रहे हैं ऐसे ही हमको बाहर से व्यवहार करना है अनेक प्रकार का लेकिन भीतर नार्मल रहें।
बड़ी सीधी सी बात है...भगवान को जानना होगा, पाना होगा... और कोई गति नहीं और कोई दूसरा मार्ग ही नहीं है।
Its very simple...you have know god and attain him...there is no any other way at all.
अलबेली मम सरकार , जो महाभाव साकार।
जेहि सेवत नंदकुमार , जेहि महिमा अपरंपार ।।
तनु दिव्य गौर सरकार , बह रोम रोम रस धार ।
रस पियत सबै ब्रजनार , जेहि छवि लखि छवि बलिहार।।
सब जग भज नंदकुमार , सोइ भज स्वामिनी सुकुमार ।
पग चापत जेहि रिझवार , सोइ मम 'कृपालु' सरकार ।।
आपकी जितनी #आयु #शेष है, यदि उसका एक-एक #श्वास आपने #भगवान् काे साैंप दिया ताे सारे पाप-तापों से #मुक्त हाेकर आप इसी #जन्म में भगवान काे पाकर #अनन्त #जीवनकी #साध पूरी कर सकते हैं। आशा है,आप मेरी #प्रार्थना पर #ध्यान देंगे।

न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा नान्यैर्देवैस्तपसा कर्मणा वा।
(३-१-८, मुण्डकोपनिषत्)
वेद कह रहा है, ये इन्द्रिय-मन-बुद्धि किसी से भी ग्राह्य नहीं है, ‘मैं’ और ‘मेरा’। और, इतना ही नहीं,
बड़ी-बड़ी तपश्चर्याओं से भी नहीं जाना जा सकता। 
बड़े-बड़े तपस्वी हुए हैं हमारे देश में, वायु खाके रहने वाले, ‘मैं’, ‘मेरे’ को नहीं जान सकते।
‘मैं’, ‘मेरे’ को वह जानता है, जिसको दिव्य बुद्धि मिले।
और दिव्य बुद्धि उसको मिलती है, जिसकी माया चली जाये।
और माया उसकी जाती है, जो भगवान् की कृपा पा ले। और भगवान् की कृपा वह प्राप्त करता है,
जो भक्ति के द्वारा अन्तःकरण शुद्ध करके अधिकारी बन जाये। तो, इसलिए इन्द्रिय-मन-बुद्धि से प्रयत्न करना ही नहीं चाहिए।
सुनी इन, कानन जब ते तान।
तब ते बिसरि गई सुधि सिगरी, कान करैं सखि! का न?।
अब सो तान सुरीली मुरलिहिं, छुटत न कैसेहुँ ध्यान।
अब सो ध्यान जरावत हमरो, सिगरो तन, मन, प्रान।
अब सो प्रान पयान करन चह, रह्यो न कछु मोहिं भान।
अब ‘कृपालु’ सोइ भान रहत इक, सुनहुँ तान नहिं आन।।
भावार्थ:– एक विरहिणी कहती है कि अरी सखी! जब से इन कानों ने श्यामसुन्दर की सुरीली तान सुनी है तब से मुझे कोई सुधि नहीं है। ये कान जो न करें वह थोड़ा है। अरी सखी! अब तो उस मुरली की तान का ध्यान एक क्षण के लिए भी नहीं हटता एवं तान का ध्यान रहने के कारण विरह में मेरा तन, मन, प्रान सभी जल रहा है और कहाँ तक कहूँ अब मेरा प्राण निकलना चाहता है। मुझे कुछ भी होश नहीं है। ‘श्री कृपालु जी’ के शब्दों में मुझे एक ही होश है कि वह तान फिर कब सुनूँ।
(प्रेम रस मदिरा:-विरह–माधुरी)
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित:-राधा गोविन्द समिति।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...