SHRI MAHARAJJI'S PERSONALITY IS THE FORM OF ABSOLUTE DIVINE LOVE THAT HAS DESCENDED ON THE EARTH PLANET TO GRACE THE SOULS WITH RADHAKRISHNA LOVE,THE 'VRINDAVAN BLISS'.THE SURPASSING MAGNITUDE OF HIS GRACIOUSNESS TRULY QUALIFIES HIS 'KRIPALU' NAME,WHICH MEANS 'THE DESCENSION OF THE POWER OF ABSOLUTE GRACE.
This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Monday, November 5, 2018
सभी सदस्यों का "DIVINE BLISS OF JAGADGURU SHRI KRIPALU JI MAHARAJ BY SHREEDHARI DIDI ग्रुप'" में हार्दिक स्वागत है। आप सभी को जय श्री राधे राधे ! ! यह ग्रुप "जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज'' के दिव्य तत्वज्ञान, उनकी रसमय वाणी, उनके पद, कीर्तन, फ़ोटो, विडियो, इत्यादि से सजी हुई फुलवारी है, जहाँ परम श्रद्धेय श्री सद्गुरु जी की कृपालुता की सुगंधी हैं, उनकी महक है।
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज इस युग के पंचम मूल जगद्गुरु हैं, जिन्हें काशी विद्वत परिषत द्वारा ''जगद्गुरुत्तम'' की उपाधि से विभूषित किया गया है. आज सारा विश्व उनके द्वारा प्रदत्त अद्वितीय तत्वज्ञान और उनके द्वारा लुटाये गए ब्रजरस को पाकर उनका हमेशा-हमेशा के लिए ऋणी हो गया है। सारा विश्व आज गौरवान्वित है जो ऐसे रसिक संत आज हम सबके बीच में हैं और जिन्होंने अपने जीवन का एक-एक क्षण हम पतित जीवों के कल्याणार्थ ही अर्पण कर दिया है, जो हम सबको सबसे बड़ा रस, ब्रज रस और श्री प्रिय प्रियतम की सेवा दिलाने को, उनका प्रेम दिलाने को आतुर है, उनकी कृपालुता धन्य है, उनका प्रेम धन्य है, उनका धाम धन्य है, उनकी वाणी धन्य है, उनका रोम रोम धन्य हैं.. वे ऐसे महापुरुष है जो केवल नाम से ही नहीं वरन जिनका स्वाभाव ही स्वभावतः 'कृपा कृपा कृपा' का ही है. ऐसे सद्गुरु की शरण जाकर हम सबको अपनी बिगड़ी संवार लेनी चाहिए। अनंतानत जन्मों से भटकते हम पापी जीवात्माएं आनंद के लिए भटक रहीं हैं, आज उसी आनंद को पाने का एक रास्ता, जो सद्गुरु देव की कृपा से अति ही सरल जान पड़ता हैं, अगर कोई गहराई से सोचे, इन महापुरुष की दया से सहज में ही मिल रहा है, तो क्यूँ न इस पापी और ढीठ मन को एक बार उनके चरणों में झुका दें और और उनका खजाना पा लें, जो अनंत हैं।
इस ग्रुप से जुडने पर आपको प्रतिदिन श्री महाराजजी के श्रीमुख से नि:सृत दिव्य अमृत वाक्य पढ़ने को मिलेंगे। उनकी लेटैस्ट इन्फॉर्मेशन भी आपको इस ग्रुप के माध्यम से उपलब्ध कराई जायेगी।
आप सभी साधकों से विनती है कि इस ग्रुप में जो की श्री महाराजजी की कृपा से ही प्रारम्भ हुआ है,इसमें श्री महाराजजी से जुड़े हुए अधिक से अधिक सत्संगी बहन-भाइयों को जोड़ते रहें। जिससे सभी को श्री महाराजजी के दिव्य तत्वज्ञान का लाभ मिल सके।
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज इस युग के पंचम मूल जगद्गुरु हैं, जिन्हें काशी विद्वत परिषत द्वारा ''जगद्गुरुत्तम'' की उपाधि से विभूषित किया गया है. आज सारा विश्व उनके द्वारा प्रदत्त अद्वितीय तत्वज्ञान और उनके द्वारा लुटाये गए ब्रजरस को पाकर उनका हमेशा-हमेशा के लिए ऋणी हो गया है। सारा विश्व आज गौरवान्वित है जो ऐसे रसिक संत आज हम सबके बीच में हैं और जिन्होंने अपने जीवन का एक-एक क्षण हम पतित जीवों के कल्याणार्थ ही अर्पण कर दिया है, जो हम सबको सबसे बड़ा रस, ब्रज रस और श्री प्रिय प्रियतम की सेवा दिलाने को, उनका प्रेम दिलाने को आतुर है, उनकी कृपालुता धन्य है, उनका प्रेम धन्य है, उनका धाम धन्य है, उनकी वाणी धन्य है, उनका रोम रोम धन्य हैं.. वे ऐसे महापुरुष है जो केवल नाम से ही नहीं वरन जिनका स्वाभाव ही स्वभावतः 'कृपा कृपा कृपा' का ही है. ऐसे सद्गुरु की शरण जाकर हम सबको अपनी बिगड़ी संवार लेनी चाहिए। अनंतानत जन्मों से भटकते हम पापी जीवात्माएं आनंद के लिए भटक रहीं हैं, आज उसी आनंद को पाने का एक रास्ता, जो सद्गुरु देव की कृपा से अति ही सरल जान पड़ता हैं, अगर कोई गहराई से सोचे, इन महापुरुष की दया से सहज में ही मिल रहा है, तो क्यूँ न इस पापी और ढीठ मन को एक बार उनके चरणों में झुका दें और और उनका खजाना पा लें, जो अनंत हैं।
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अगर आपको इस ग्रुप से जुड़ने पर वास्तविक लाभ होता है तो मन ही मन श्री महाराजजी का आभार व्यक्त करें की उनकी ही कृपा से उनका अमूल्य तत्वज्ञान आपको यहाँ मिल रहा है।
आप सभी के सुझाव इस ग्रुप को और बेहतर बनाने के लिए भी आमंत्रित हैं।
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**************जय-जय श्री राधे*************
Sunday, October 21, 2018
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जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज इस युग के पंचम मूल जगद्गुरु हैं, जिन्हें काशी विद्वत परिषत द्वारा ''जगद्गुरुत्तम'' की उपाधि से विभूषित किया गया है. आज सारा विश्व उनके द्वारा प्रदत्त अद्वितीय तत्वज्ञान और उनके द्वारा लुटाये गए ब्रजरस को पाकर उनका हमेशा-हमेशा के लिए ऋणी हो गया है। सारा विश्व आज गौरवान्वित है जो ऐसे रसिक संत आज हम सबके बीच में हैं और जिन्होंने अपने जीवन का एक-एक क्षण हम पतित जीवों के कल्याणार्थ ही अर्पण कर दिया है, जो हम सबको सबसे बड़ा रस, ब्रज रस और श्री प्रिय प्रियतम की सेवा दिलाने को, उनका प्रेम दिलाने को आतुर है, उनकी कृपालुता धन्य है, उनका प्रेम धन्य है, उनका धाम धन्य है, उनकी वाणी धन्य है, उनका रोम रोम धन्य हैं.. वे ऐसे महापुरुष है जो केवल नाम से ही नहीं वरन जिनका स्वाभाव ही स्वभावतः 'कृपा कृपा कृपा' का ही है. ऐसे सद्गुरु की शरण जाकर हम सबको अपनी बिगड़ी संवार लेनी चाहिए। अनंतानत जन्मों से भटकते हम पापी जीवात्माएं आनंद के लिए भटक रहीं हैं, आज उसी आनंद को पाने का एक रास्ता, जो सद्गुरु देव की कृपा से अति ही सरल जान पड़ता हैं, अगर कोई गहराई से सोचे, इन महापुरुष की दया से सहज में ही मिल रहा है, तो क्यूँ न इस पापी और ढीठ मन को एक बार उनके चरणों में झुका दें और और उनका खजाना पा लें, जो अनंत हैं।
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आप सभी साधकों से विनती है कि इस ग्रुप में जो की श्री महाराजजी की कृपा से ही प्रारम्भ हुआ है,इसमें श्री महाराजजी से जुड़े हुए अधिक से अधिक सत्संगी बहन-भाइयों को जोड़ते रहें। जिससे सभी को श्री महाराजजी के दिव्य तत्वज्ञान का लाभ मिल सके।
अगर आपको इस ग्रुप से जुड़ने पर वास्तविक लाभ होता है तो मन ही मन श्री महाराजजी का आभार व्यक्त करें की उनकी ही कृपा से उनका अमूल्य तत्वज्ञान आपको यहाँ मिल रहा है।
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**************जय-जय श्री राधे*************
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श्याम! हौं योगिनि भेष बनैहौं।
लोक, वेद, कुल–कानि–आनि तजि, त्रिकुटी ध्यान लगैहौं।
जटाजूट निज शीश बँधैहौं, अंग विभूति लगैहौं।
कंथा पहिरि पाणि लै खप्पर, अनशन देह सुखैहौं।
धरि अवधूत स्वाँग जनु शंकर, घर घर अलख जगैहौं।
जो ‘कृपालु’ पिय तबहुँ न पैहौं, विरहागिनि जरि जैहौं।।
लोक, वेद, कुल–कानि–आनि तजि, त्रिकुटी ध्यान लगैहौं।
जटाजूट निज शीश बँधैहौं, अंग विभूति लगैहौं।
कंथा पहिरि पाणि लै खप्पर, अनशन देह सुखैहौं।
धरि अवधूत स्वाँग जनु शंकर, घर घर अलख जगैहौं।
जो ‘कृपालु’ पिय तबहुँ न पैहौं, विरहागिनि जरि जैहौं।।
भावार्थ:– एक विरहिणी कहती है कि हे श्यामसुन्दर! अब मैं तुम्हारे मधुर–मिलन के लिए योगिनी का वेश बनाऊँगी। लोक, वेद, एवं वंश की समस्त आन–बान को छोड़कर त्रिकुटी के मध्य में ध्यान लगाऊँगी। अपने सिर पर जटा–जूट बँधाऊँगी एवं सारे शरीर में भस्म लगाऊँगी। गुदड़ी ओढ़कर एवं हाथ में कमंडल लेकर बिना अन्न–जल के उपवास द्वारा अपने शरीर को सुखा दूँगी। मैं अवधूतों की तरह स्वाँग बनाकर शंकर जी के समान घर–घर में ‘अलख’ ‘अलख’ का नारा लगाऊँगी। ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि इतना करने पर भी यदि प्रियतम को दया न आयेगी एवं वे दर्शन न देंगे, तब मैं विरह की अग्नि में जलकर भस्म हो जाऊँगी।
(प्रेम रस मदिरा:-विरह–माधुरी)
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज।
सर्वाधिकार सुरक्षित:-राधा गोविन्द समिति।
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज।
सर्वाधिकार सुरक्षित:-राधा गोविन्द समिति।
If we worship Shri Krishna as a Supreme Almighty Personality, we will feel fear, hesitation and distance. This will become a hindrance in establishing a close relationship with Him. Rasika Saints have emphasised devotion to Lord Krishna through intimate relationships such as we have in the material world. These relationships of the devotee and God are known as bhavas. There are five bhavas: shanta, dasya, sakhya, vatsalya and madhurya. All the aspects of Love, i.e. God as our King, Master, Friend, Child and Beloved have been established in order to make us feel closer to God.
माई री मैं तो! आजु परी निधि पाई।
जेहि खोजत मोहिं युग युग बीत्यो, पर् यो न कतहुँ लखाई।
तेहि मोहिँ साधनहीन जानि के, रसिकन दई बताई।
पारस लहि बौरात रंक ज्यों, त्यों हौं गई बौराई।
भरी गुमान रैन दिन डोलति, करति सदा मनभाई।
सो ‘कृपालु’ बिनु मोल मिलत निधि, राधे नाम सदाई।।
जेहि खोजत मोहिं युग युग बीत्यो, पर् यो न कतहुँ लखाई।
तेहि मोहिँ साधनहीन जानि के, रसिकन दई बताई।
पारस लहि बौरात रंक ज्यों, त्यों हौं गई बौराई।
भरी गुमान रैन दिन डोलति, करति सदा मनभाई।
सो ‘कृपालु’ बिनु मोल मिलत निधि, राधे नाम सदाई।।
भावार्थ:–अरी माई! मुझे तो आज बिना परिश्रम के ही पड़ा हुआ खजाना मिल गया। जिस निधि को खोजते हुए मुझे अनन्तानन्त जन्म बीत गये फिर भी जो कहीं नहीं प्राप्त हुई, रसिकों ने मुझे समस्त साधनाओं से हीन समझ कर उसे बता दिया। जिस प्रकार एक भिखारी सहसा पारस पा जाने पर पागल हो जाता है, उसी प्रकार मैं भी उस निधि को पाकर उन्मत्त सी हो गयी। अब मैं बड़े ही गर्व के साथ, किसी की परवाह न करते हुये, दिन रात विचरा करती हूँ तथा अनादिकाल से अपूर्ण इच्छाओं को पूर्ण कर रही हूँ। ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि वह निधि ‘राधे’ नाम की है एवं रसिकों की कृपा से सर्वत्र ही प्राप्त है।
(प्रेम रस मदिरा:-सिद्धान्त–माधुरी)
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज।
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ए # मनुष्यों ! # मानव_देह प्राप्त हुआ है , # भगवतप्राप्ति के लिये केवल, इसकाे मत गँवाओ, व्यर्थ # भाेग_विलास में केवल लिप्त रह कर...






