गुरु को भगवत्स्वरूप मानकर तन-मन-धन से उनकी सेवा करने से अंतःकरण शुद्ध होता है।
This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Monday, May 20, 2019
कलियुग में भगवन्नाम, गुण लीलादि संकीर्तन ही भगवत्प्राप्ति का एकमात्र मार्ग है । भुक्ति,मुक्ति की कामनाओँ से रहित हो कर हरि-गुरु का रूपध्यान करते हुए,उनसे अत्यन्त दीनतापुर्वक,रोकर,दिव्य प्रेम की याचना करने से ही अन्तःकरण शुद्ध होगा । तब गुरु कृपा से दिव्य प्रेम की प्राप्ति होगी जिससे श्री राधाकृष्ण की नित्य सेवा का अधिकारी बन कर जीव सदा-सदा केलिये कृतार्थ हो जाएगा।
हरेर्नामैव नामैव नामैव मम जीवनम्।
कलौ नास्तैव नास्तैव नास्तैव गतिरन्यथा ॥
कलौ नास्तैव नास्तैव नास्तैव गतिरन्यथा ॥
ये #राम का नाम ऐसा है कि भव का बीज, चौरासी लाख योनियों में जो चक्कर लगा रहा है इसका बीज जो है अविद्या माया, उसको भस्म कर देता है। भगवन्नाम का गर्जन उच्च संकीर्तन दिव्यानन्द प्रदान करता है और यमदूतों को डरा देता। अरे यहाँ राम नाम बोला जाता इधर मत चलो... ऐसा है भगवन्नाम ॥
दीन के तुम ही दीनानाथ।
नर किन्नर सुर कोउ देत नहिं, दीन हीन को साथ।
जब लौं तन धन जन को बल रह, गावत सब गुन गाथ।
लखतहिं निबल प्रबल स्वारथरत, तजत दंपतिहुं हाथ।
पुनि उन बाँह गहे न गहे का ? तुम बिनु सबै अनाथ।
अब कृपालु अपनाय ‘कृपालुहिं’ धरहु हाथ मम माथ।।
नर किन्नर सुर कोउ देत नहिं, दीन हीन को साथ।
जब लौं तन धन जन को बल रह, गावत सब गुन गाथ।
लखतहिं निबल प्रबल स्वारथरत, तजत दंपतिहुं हाथ।
पुनि उन बाँह गहे न गहे का ? तुम बिनु सबै अनाथ।
अब कृपालु अपनाय ‘कृपालुहिं’ धरहु हाथ मम माथ।।
भावार्थ:- हे दीनानाथ श्यामसुन्दर! दीन जनों के एकमात्र तुम्हीं नाथ हो। हे श्यामसुन्दर! मनुष्य, किन्नर, देवता आदि कोई भी असमर्थ का साथ नहीं देता। संसार में जब तक किसी के पास शरीर, सम्पति एवं व्यक्तियों का बल रहता है तब तक सभी लोग उसके गुण गाया करते हैं और जैसे ही वह इन साधनों से रहित हो जाता है, वैसे ही प्रबल स्वार्थी प्राणाधिक प्यार का वादा करने वाले स्त्री पति भी हाथ छोड़ देते हैं। फिर इन मायाधीन रंग साथियों के हाथ पकड़ने से भी क्या लाभ। तुम्हारे बिना मैं अनाथ के समान हूँ। ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं–हे श्यामसुन्दर! अब ‘कृपालु’ को अपनाकर कृतार्थ करो, एवं अपना हाथ सदा के लिए मेरे सिर पर रख दो।
(प्रेम रस मदिरा:- दैन्य–माधुरी)
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज।
सर्वाधिकार सुरक्षित:- राधा गोविन्द समिति।
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प्रिय मित्रों...जय श्री राधे!
आप सभी से करबद्ध निवेदन है कि आप लोग #जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज_की_प्रचारिका_सुश्री_श्रीधरी_दीदी के #Official_Youtube_चैनलhttps://www.youtube.com/shreedharididi को #Subscribe करें और Bell icon भी Press करें जिससे आपको वहाँ पर पोस्ट किए गए #Latest_Videos की नोटिफिकेशन भी प्राप्त होती रहेगी।
जैसा कि आपको पिछले दिनों बताया गया था कि हमने इस चैनल पर #Short_Videos की श्रृंखला भी Start की है, इसी कड़ी में '#भगवान_का_ज्ञान_कैसे_होगा' विषय पर संक्षिप्त Video पोस्ट किया गया है। सभी लोग लाभ लें।
जब व्यस्तता के कारण आप अधिक अवधि वाले Videos देखने का समय नहीं निकाल पाते तब इन Short Videos के माध्यम से भी श्री महाराज जी द्वारा प्रगटित इस दिव्य तत्त्वज्ञान का Revision होता रहेगा। और ये Divine Philosophy आपको हर तरह की परिस्थितियों को हैंडल करने में समय-समय पर सहायता प्रदान करती रहेगी।
तत्त्वज्ञान का Revision अत्यंत आवश्यक है, इसलिए फेसबुक,Youtube के माध्यम से भी हम उसको पढ़कर,सुनकर पक्का करते रहें तो और अधिक लाभ होगा।
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जैसा प्रेम एवं सहयोग आप सभी मित्रों का हमको Facebook पर प्राप्त होता रहा है,आशा है हमारे इस Youtube चैनल https://www.youtube.com/shreedharididi
को भी वैसा ही प्रेम,आशीर्वाद एवं सहयोग प्राप्त होगा। आप सभी श्री महाराज जी के साधकों का ये परम कर्तव्य है कि अधिक से अधिक लोगों तक श्री महाराज जी के दिव्य ज्ञान को पहुँचाने में आप हमारी मदद कीजिये। आप स्वयं भी Subscribe कीजिये और अपने ईष्ट मित्रों को भी इस youtube चैनल https://www.youtube.com/shreedharididi
पर Subscribe करने के लिए प्रेरित कीजिये।अधिक से अधिक Like,Comment एवं Share कीजिये। यहाँ पर आपको श्री महाराज जी द्वारा प्रगटित विशुद्ध तत्त्वज्ञान श्रीधरी दीदी की सुमधुर वाणी में श्रवण करने का सुअवसर मिलेगा। आशा है आप लोग मुझे निराश नहीं करेगें और अपने कर्तव्य का सहर्ष पालन करेंगे।
राधे-राधे।
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निवेदक:
आपका नगण्य भाई:
शरद गुप्ता।
आपका नगण्य भाई:
शरद गुप्ता।
सखी! मैं, सुनी कालि इक बात।
सखिन जूह जुरि-जुरि कालिन्दी, पुलिन रहीं बतरात।
एक सखी कह ‘प्रान तजहु अब, मिलहिं न पिय किय घात’।
अपर सखी कह ‘जब पिय सुनिहैं, तजि दैहैं निज गात’।
एक सखी पुनि यौं उठि बोली, ‘प्रान रहे केहि भाँत’।
अपर सखी कह ‘कोटि कल्प लौं, परखहु पद-जलजात’।
कह ‘कृपालु’ ग्रीष्म ऋतु बीते, आवति पुनि बरसात।।
सखिन जूह जुरि-जुरि कालिन्दी, पुलिन रहीं बतरात।
एक सखी कह ‘प्रान तजहु अब, मिलहिं न पिय किय घात’।
अपर सखी कह ‘जब पिय सुनिहैं, तजि दैहैं निज गात’।
एक सखी पुनि यौं उठि बोली, ‘प्रान रहे केहि भाँत’।
अपर सखी कह ‘कोटि कल्प लौं, परखहु पद-जलजात’।
कह ‘कृपालु’ ग्रीष्म ऋतु बीते, आवति पुनि बरसात।।
भावार्थ:– (सखियों के परस्पर किये हुए वार्तालाप को सुनकर एक सखी दूसरी सखी से कहती हैं।)
अरी सखी! मैंने कल एक बात सुनी है। कल यमुना किनारे सखियों का समुदाय इकट्ठा होकर परस्पर बातें कर रहा था। सर्वप्रथम एक सखी ने समस्त सखियों के समक्ष यह प्रस्ताव रखा कि अरी सखियों! अब हम सबको प्राण छोड़ देना ही उचित है, क्योंकि श्यामसुन्दर ने विश्वासघात किया है, अब वे नहीं आयेंगे। दूसरी सखी ने पहली सखी की बात काटते हुए कहा कि यह उचित नहीं है, क्योंकि जब हमारी मृत्यु का समाचार प्रियतम पावेंगे तक वे भी अत्यन्त दु:खी होकर अपना प्राण छोड़ देंगे, अतएव अपने सुख के लिए प्रियतम को दु:खी करना यह प्रेम लक्ष्य नहीं है। इस पर तीसरी सखी ने कहा कि यह तो मैं भी जानती हूँ, पर यह बताओ कि किस प्रकार प्राण धारण करूँ? इस पर चौथी सखी ने कहा कि करोड़ों कल्प तक प्रियतम के दर्शनों की प्रतीक्षा करते हुए प्राण धारण करना चाहिए, क्योंकि निराशा प्रेम का स्वरूप नहीं है। प्राण तो कोई विरहिणी तब छोड़ना चाहेगी जब उसे प्रियतम के मिलन की आशा ही न रह जाय। ‘श्री कृपालु जी’ समस्त सखियों से कहते हैं कि ऐ री सखियों! चिन्ता मत करो ग्रीष्मऋतु-रूपी वियोग के बाद वर्षाऋतु-रूपी मधुर-मिलन का शुभागमन होगा ही।
अरी सखी! मैंने कल एक बात सुनी है। कल यमुना किनारे सखियों का समुदाय इकट्ठा होकर परस्पर बातें कर रहा था। सर्वप्रथम एक सखी ने समस्त सखियों के समक्ष यह प्रस्ताव रखा कि अरी सखियों! अब हम सबको प्राण छोड़ देना ही उचित है, क्योंकि श्यामसुन्दर ने विश्वासघात किया है, अब वे नहीं आयेंगे। दूसरी सखी ने पहली सखी की बात काटते हुए कहा कि यह उचित नहीं है, क्योंकि जब हमारी मृत्यु का समाचार प्रियतम पावेंगे तक वे भी अत्यन्त दु:खी होकर अपना प्राण छोड़ देंगे, अतएव अपने सुख के लिए प्रियतम को दु:खी करना यह प्रेम लक्ष्य नहीं है। इस पर तीसरी सखी ने कहा कि यह तो मैं भी जानती हूँ, पर यह बताओ कि किस प्रकार प्राण धारण करूँ? इस पर चौथी सखी ने कहा कि करोड़ों कल्प तक प्रियतम के दर्शनों की प्रतीक्षा करते हुए प्राण धारण करना चाहिए, क्योंकि निराशा प्रेम का स्वरूप नहीं है। प्राण तो कोई विरहिणी तब छोड़ना चाहेगी जब उसे प्रियतम के मिलन की आशा ही न रह जाय। ‘श्री कृपालु जी’ समस्त सखियों से कहते हैं कि ऐ री सखियों! चिन्ता मत करो ग्रीष्मऋतु-रूपी वियोग के बाद वर्षाऋतु-रूपी मधुर-मिलन का शुभागमन होगा ही।
(प्रेम रस मदिरा:- विरह-माधुरी)
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज।
सर्वाधिकार सुरक्षित:- राधा गोविन्द समिति।
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज।
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#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज_की_प्रचारिका#सुश्री_श्रीधरी_दीदी_द्वारा_जयपुर_के_निकट_दौसा_ज़िले_में_#श्री_महाराजजी_के_सत्संग_केंद्र_#निर्धन_बच्चों_के_लिए_निःशुल्क_स्कूल_एवं_गौशाला_निर्माण_हेतु_निवेदन।
हरि- गुरु चरणानुरागी भक्तवृन्द !
आप सभी भगवत्प्रेमियों का सहज-स्नेह (क्योंकि ईश्वरीय अनुराग के अतिरिक्त आपका मुझसे कोई और स्वार्थ नहीं है, और ये आध्यात्मिक स्वार्थ ही हर प्रकार से वंदनीय है) व हमारे जगद्वन्द्य गुरुवर जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज के अद्वितीय दिव्य सिद्धांतों के प्रचार-प्रसार की सेवा में आपका प्रशंसनीय सहयोग हमें निरंतर प्राप्त हो रहा है । इस भगवदीय प्रीति व सहयोग के लिए मैं हृदय से आपकी आभारी हूँ और बारम्बार साधुवाद के साथ आगे भी और अधिक सहयोग की आशा करती हूँ।
आप सभी भगवत्प्रेमियों का सहज-स्नेह (क्योंकि ईश्वरीय अनुराग के अतिरिक्त आपका मुझसे कोई और स्वार्थ नहीं है, और ये आध्यात्मिक स्वार्थ ही हर प्रकार से वंदनीय है) व हमारे जगद्वन्द्य गुरुवर जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज के अद्वितीय दिव्य सिद्धांतों के प्रचार-प्रसार की सेवा में आपका प्रशंसनीय सहयोग हमें निरंतर प्राप्त हो रहा है । इस भगवदीय प्रीति व सहयोग के लिए मैं हृदय से आपकी आभारी हूँ और बारम्बार साधुवाद के साथ आगे भी और अधिक सहयोग की आशा करती हूँ।
और इतने दिनों से Social Media के माध्यम से मैं भी आपकी स्नेह रज्जु में बँधी हुई हूँ इसलिए अपना मानकर ही आप सभी से एक और सहयोग की अपेक्षा करते हुए कुछ निवेदन करना चाहती हूँ। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आप मेरी किसी भी बात को अन्यथा न लेते हुए इस वास्तविक स्थिति को समझकर अपना पूर्ण सहयोग प्रदान करेंगें।
आप में से अधिकांश लोग जानते ही हैं कि मैं पिछले लगभग 15 वर्षों से राजस्थान की राजधानी जयपुर व आस पास के क्षेत्रों में श्री महाराज जी की आज्ञा से प्रचार की सेवा कर रही हूँ। लेकिन प्रतिवर्ष यहाँ श्री महाराज जी के प्रवचन, जगद्गुरु कृपालु परिषत(JKP) की तीनों अध्यक्षाओं के सान्निध्य में साधना शिविरों का आयोजन, अन्य प्रचार कार्यों की व्यस्तता के कारण यहाँ अब तक कभी स्थायी सत्संग केंद्र के विषय में अधिक विचार नहीं किया।
लेकिन अब चूंकि बदलते समय के साथ ही यहाँ पर संकीर्तन, अन्य पर्वों इत्यादि के आयोजन के दौरान सत्संग कार्यक्रमों में अस्थायी हॉल में प्रैक्टिकल प्रॉब्लम्स दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रहीं हैं , आर्थिक अपव्यय भी होता है, इसीलिए इसके स्थायी समाधान पर विचार करते हुए,आगे भी सभी के पारमार्थिक लाभ के लिए , एक स्थायी सत्संग केंद्र इस एरिया में बनवाना चाहती हूँ जिसमें समय-समय पर हमारी ट्रस्ट के द्वारा आयोजित अन्य चैरिटेबल एक्टिविटीज़ भी सुविधापूर्वक सम्पन्न होती रहें।
लेकिन अब चूंकि बदलते समय के साथ ही यहाँ पर संकीर्तन, अन्य पर्वों इत्यादि के आयोजन के दौरान सत्संग कार्यक्रमों में अस्थायी हॉल में प्रैक्टिकल प्रॉब्लम्स दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रहीं हैं , आर्थिक अपव्यय भी होता है, इसीलिए इसके स्थायी समाधान पर विचार करते हुए,आगे भी सभी के पारमार्थिक लाभ के लिए , एक स्थायी सत्संग केंद्र इस एरिया में बनवाना चाहती हूँ जिसमें समय-समय पर हमारी ट्रस्ट के द्वारा आयोजित अन्य चैरिटेबल एक्टिविटीज़ भी सुविधापूर्वक सम्पन्न होती रहें।
अभी हाल ही में जयपुर के निकट ही 'दौसा जिले' में भगवदिच्छा से ही एक धार्मिक सज्जन ने बिना मांगे ही लगभग 6500 गज ज़मीन हमारी 'राधागोविंद पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट' को दान में दी है। और उनकी यही इच्छा है कि अब शीघ्र ही जनसहयोग से हम इसका सदुपयोग एक सत्संग केंद्र, गोशाला , व निर्धन बच्चों की नि:शुल्क शिक्षा के रूप में करें। अतएव इस लोकोपकारी प्रोजेक्ट के लिए मुझे आप सभी का उदार सहयोग चाहिए। क्योंकि ये दूरगामी योजनायें आप सभी के लाभ के लिए ही हैं और बिना आपके सहयोग के क्योंकि बजट इतना ज़्यादा है कि पूर्ण भी नहीं हो सकतीं।
आप सभी जानते ही हैं श्री महाराज जी ने जीवों के आध्यात्मिक विकास के साथ ही उनके भौतिक विकास पर भी सदैव ध्यान दिया है ताकि उनका सर्वांगीण विकास हो सके । शिक्षा हमारे जीवन में इतनी अधिक महत्त्वपूर्ण है कि उसके बिना व्यक्ति की तुलना पशु से की गई है- 'विद्या विहीन: पशु: ' ( भर्तिहरि ) । लेकिन आज भी हमारे समाज में लाखों लोग ऐसे हैं जो धन के अभाव में जीवन की इस मूलभूत आवश्यकता की भी पूर्ति नहीं कर पाते और अशिक्षित ही रह जाते हैं। इसलिए समाज के समर्थ लोगों का ये परम कर्तव्य है कि वे इन सेवाओं के लिए भी अपना पूर्ण सहयोग प्रदान करें विशेषकर तब जब ये निःशुल्क विद्यालय बिना किसी स्वार्थ के किसी आध्यात्मिक संस्था के द्वारा चलाये जायें , जिनमें उनके आध्यात्मिक विकास का भी प्रयत्न किया जाए जैसे श्री महाराज जी द्वारा कुंडा में निर्मित निःशुल्क शिक्षण संस्थानों में किया जा रहा है। बच्चे ही समाज का भविष्य हैं, और सही शिक्षा व आध्यात्मिकता के विकास से ही इन्हें भावी समाज का जिम्मेदार नागरिक बनाया जा सकता है इसमें इनका भी कल्याण निहित है, और सम्पूर्ण समाज का, देश का, मानवजाति का भी।
और गौशाला का जो प्रस्ताव मेरे पास आया है वो भी सराहनीय है क्योंकि आज हमारे ठाकुर जी की प्रिय गोमाता की दयनीय स्थिति से आप सभी परिचित हैं। भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं नंगे चरण वन में गोचारण किया, उनकी सेवा की , अपने अद्भुत गो प्रेम के कारण ही वे अनंत कोटि ब्रह्मांड पाल होकर भी 'गोपाल' कहलाये। जिस गोमाता का गोबर, मूत्र इत्यादि भी पवित्रता का सूचक हो, बड़े बड़े धार्मिक अनुष्ठानों में स्थान की शुद्धि इत्यादि हेतु प्रयोग में लाया जाता हो, अनेक रोगों के निवारण के काम आता हो वो गौ वास्तव में सबकी माता ही है जो अपने दुग्ध के दान से समस्त मानवजाति को पुष्ट करती है। उसे मात्र पशु समझने वाले और निर्दयता का आचरण करने वाले सभी मनुष्य स्वयं अपने लिए नरक जाने का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। ऐसे निर्मम मनुष्यों से उनकी रक्षा करना और गोमाता की सेवा करना सभी के लिए सौभाग्य की बात है। इसीलिए सरकार के द्वारा भी और समाज के कई वर्गों के द्वारा भी गोसेवा का प्रशंसनीय कार्य किया जा रहा है। आप सब भी हमारे साथ इस सेवा में सहयोगी बनकर गोसेवा का पुण्य प्राप्त कर सकते हैं।
वैसे तो 'वसुधैव कुटुम्बकं' के अनुसार ये समस्त विश्व हमारा है क्योंकि हम सभी उस एक परम पिता की ही संतान हैं इसलिए इस ईश्वरीय कार्य में सभी का सहयोग अपेक्षित है लेकिन चूँकि उस ईश्वर को सभी अपना पिता मानते नहीं , सभी व्यक्ति धार्मिक नहीं इसलिए धर्म में, ईश्वर में, गुरु चरणों में प्रीति रखने वाले आप जैसे भगवद्भक्तों से ही सहयोग की अपील की जा सकती है, जो वास्तव में सत्संग का महत्त्व समझते हैं और ये भी समझते हैं कि बिना अर्थ के आज के युग में धार्मिक कार्य भी सम्पन्न नहीं हो सकते।
श्री महाराज जी सत्संग की महिमा बताते हुए 'राधा गोविंद गीत' में कहते हैं -
स्वर्ग अपवर्ग सुख गोविंद राधे।
मिलि सत्संग सुख सम ना बता दे।।
मिलि सत्संग सुख सम ना बता दे।।
सत्संग सम सुख गोविंद राधे।
भुक्ति - मुक्ति वैकुंठ का ना बता दे।।
भुक्ति - मुक्ति वैकुंठ का ना बता दे।।
अर्थात् सत्संग का सुख भुक्ति, मुक्ति, वैकुंठ के सुख से भी बढ़कर है, फिर श्री महाराज जी के अद्वितीय सत्संग के विषय में क्या कहा जाये ? उनके सत्संग के व्यापक प्रचार - प्रसार हेतु धन का दान करना तो सर्वश्रेष्ठ दान है, धन का वास्तविक सदुपयोग है जिससे आपके साथ साथ अन्य जीवों का भी पारमार्थिक कल्याण होता है।
इतने दिनों से आप हमारे संपर्क में हैं इसलिये पारमार्थिक दान की महिमा भी समझते ही हैं, और श्री महाराज जी के अद्वितीय सत्संग की भी ( जिसकी इस समय विश्व को सबसे अधिक आवश्यकता है ) । अतएव संक्षेप में बस इतना ही निवेदन करना चाहती हूँ कि हरि-गुरु के होने के नाते हम केवल एक दूसरे को अपना मान लें, और श्री महाराज जी के सत्संग संबंधी कार्यों को अपना कार्य, तो सभी कार्य चुटकियों में सम्पन्न हो सकते हैं। इनमें सहभागी बनकर हम अपना भी कल्याण करें व दूसरों के कल्याण का मार्ग भी प्रशस्त करें जिस सेवा से हमारे हरि गुरु सर्वाधिक प्रसन्न होते हैं।
इन सभी सेवाओं से जुड़ने का आध्यात्मिक फल , आत्मतुष्टि आपको प्रत्यक्ष अनुभव में आएगी, हरि गुरु चरणों में प्रीति भी निरन्तर बढ़ती जाएगी।
एक कदम बढ़ाकर विश्वास करके तो देखें।
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धन्यवाद।
राधे-राधे।
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