Saturday, June 1, 2019

ऐसे शब्द ज्ञानी भी गोविंद राधे।
ज्ञान दे आपु रहे कोरा बता दे ।।
भावार्थ- जिसे केवल शास्त्रीय ज्ञान है, ईश्वर का अनुभव नहीं है वह दूसरों को ज्ञान तो प्रदान कर सकता है किन्तु प्रेम के बिना वह स्वयं अज्ञानी ही बना रहता है।
शास्त्रानभिज्ञ जन गोविंद राधे।
विरक्त भी ज्ञान दे ना बता दे।।
भावार्थ- शास्त्र ज्ञान से रहित कोई यदि पूर्ण विरक्त भी है तो भी वह किसी को ज्ञान प्रदान नहीं कर सकता।
गुरु वेदवित हो गोविंद राधे।
दिव्य प्रेमयुक्त भी हो हरि ते मिला दे।।
भावार्थ- गुरु जो शास्त्रों वेदों का ज्ञाता भी हो और जिसके पास दिव्य प्रेम भी हो वही भगवत्प्राप्ति करा सकता है।
आनंदसिंधु भगवान को पाकर ही जीव सदा सदा के लिए आनंदमय हो सकता है, इसके अतिरिक्त आनंदप्राप्ति का कोई और उपाय नहीं है, नहीं है, नहीं है।
सखी! ये, दृग न दृगन सुख पाये।
निरखत ही छवि नव नीरद तनु, आनँद जल भरि आये।
पुनि बिछुरत ही श्याम सुरति करि, दृग अँसुवन झरि लाये।
दुहूँ भाँति तिय लखि न सकति पिय, बिनु देखे घबराये
विधि बुधि गइ सठियाय हाय! जो अँखियन पलक बनाये।
करि ‘कृपालु’ पिय दृग पट, पलकनि, क्यों न कपाट लगाये।।
भावार्थ:–(एक विरहिणी अपनी अन्तरंग सखी से कहती है।)
अरी सखी! इन आँखों को देखने का सुख कभी न मिला। क्योंकि जब ही नवीन बादलों की कान्ति के समान चिन्मय देह वाले श्यामसुन्दर को देखती हैं, तभी इन आँखों में आनन्द के आँसू भर आते हैं जिससे श्यामसुन्दर को नहीं देख पातीं एवं श्यामसुन्दर के वियोग में उनका स्मरण करके आँखों में जल भरा रहता है, अतएव इन आँखों को प्रियतम के दर्शन का सुख कभी नहीं मिल पाता इसके अतिरिक्त ब्रह्मा की बुद्धि भी भ्रष्ट–सी हो गयी जिसने आँखों में पलक बनाकर प्रियतम के मिलने में और भी एक व्यवधान–सा पैदा कर दिया है। ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि अरी सखी! तू इस झगड़े में क्यों पड़ती है? तू अपने प्रियतम को आँखों के कमरे में बन्द करके पलकों के किवाड़ लगाकर नित्य ही मधुर–मिलन का अनुभव किया कर।
(प्रेम रस मदिरा:-विरह–माधुरी)
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित:-राधा गोविन्द समिति।
The first step of devotion is to have full faith in your Spiritual Master and surrender to his lotus feet.
लो स्वामिनि मोहिँ अपनाय रे।
दर दर ठोकर खाऊँ तिहारोइ, दासी दास कहाय रे।
नित गुन गान करूँ तुम्हरोई, तदपि न अहमिति जाय रे।
साँची झूठ न आपुन निंदा, सुनतहिं मन हरषाय रे।
सब जानत पै मानत नाहीं, यह अचरज दरसाय रे।
तुम ‘कृपालु’ मोहिं जानति नीकी, पुनि क्यों बेर लगाय रे।।
भावार्थ:- हे स्वामिनी जी! अब तो मुझे अपना लो। तुम्हारा ही कहला कर दर-दर की ठोकर खा रहा हूँ। यद्यपि तुम्हारे ही गुणों को गाता हूँ फिर भी अहंकार नहीं जाता। अपनी झूठी सच्ची निन्दा को सुनकर मन को आनन्द नहीं मिलता। वह केवल प्रशंसा ही चाहता है। आश्चर्य तो यह है कि सब कुछ जानते हुए भी नहीं मानता। ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि हे किशोरी जी! तुम तो हृदय की जानने वाली हो फिर क्यों देर कर रही हो।

(प्रेम रस मदिरा:-दैन्य-माधुरी)
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित:-राधा गोविन्द समिति।
The spiritual teachings of #Jagadguru_Shri_Kripalu_Ji_Maharaj are certainly His greatest contribution to society. His philosophy concentrates on creating a balance in life by taking care of the physical body, as well as nurturing the soul. Shri Maharaj Ji teaches and inspires His devotees from all walks of life to achieve this balance through selfless service and devotion to God.
At present, there are 11 religions that are prevalent in the world – Hindu Vedic, Jain, Baudha, Christianity, Sikh, Islam, Jew, Persian, Tao, Confucian, and Shinto. In all these religions there are contradictions in the prescribed methods for attainting the ultimate goal of an individual soul. There are contradictions within a given religion itself. Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj, with due respect to all these religions, has reconciled all the contradictory philosophies, and has prescribed a path which is common and acceptable to all, with great simplicity, clarity and perfection, that even the profoundest spiritual wisdom can be easily understood by a common man.
JAI SHRI RADHEY.
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराजजी से साधक का प्रश्न: जब हम अपने दोस्त,रिश्तेदार आदि को भगवद विषय समझाने का प्रयत्न करते हैं तब समझने के बजाय कभी-कभी वे और अकड़ जाते हैं। इससे हमे बहुत दुख होता है। ऐसे में हम क्या करें?
श्री महाराजजी द्वारा उत्तर: अश्रद्धालु एवं अनाधिकारी से अपने मार्ग अथवा साधना आदि के विषय में वाद-विवाद करना भी कुसंग है,क्योंकि जब अनाधिकारी को सर्वसमर्थ महापुरुष भी आसानी के साथ बोध नहीं करा पाता,तब साधक भला किस खेत की मूली है। यदि कोई परहित की भावना से भी समझाना चाहता है,तब भी उसे ऐसे नहीं करना चाहिए,क्योंकि अश्रद्धालु होने के कारण उसका विपरीत ही परिणाम होगा। साथ ही अश्रद्धालु के न मानने पर साधक का चित्त अशांत हो जाता है।
शास्त्रानुसार भी भक्तिमार्ग को लेकर वाद-विवाद करना घोर पाप है। अतएव न तो वादविवाद सुनना चाहिए,न तो स्वयं करना चाहिए। यदि अनाधिकारी जीव इन विषयों को नहीं समझता ,तो इसमें आश्चर्य या दुख भी नहीं होना चाहिए,क्योंकि कभी तुम भी तो नहीं समझते थे। यह तो परम सौभाग्य महापुरुष एवं भगवान की कृपा से प्राप्त होता है कि जीव भगवदविषय को समझकर उसकी और उन्मुख हो।
अनाधिकारी को भगवदविषयक कोई अंतरंग रहस्य भी न बताना चाहिए,क्योंकि वर्तमान अवस्था में अनुभवहीन होने के कारण अनाधिकारी उन अचिंत्य विषयों को नहीं समझ सकता। उलटे अपराध कमाकर अपनी रही सही अस्मिता को भी खो बैठेगा। साथ ही अंतरंग रहस्य बताने वाले साधक को भी अशांत करेगा।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...