Saturday, June 1, 2019

भगवान् की कृपा देखो कि उसने कृपा करके मानव देह दिया, मन में भगवत जिज्ञासा दी, महापुरुष से मिलाया, इन कृपाओं को हम महसूस करें तो हमारा हृदय पत्थर न बना रहे पिघल जाय।
अपने को अधम पतित मानकर मनुहार करो और आंसू बहाकर भगवान् के निष्काम प्रेम की कामना करो। संसार न मांगो। तब भगवान् महापुरुष के द्वारा अपना दिव्य स्वरुप दिखायेंगे।
श्री महाराजजी से प्रश्न:- संसार में और भगवत क्षेत्र में हमारा व्यवहार कैसा होना चाहिए?
श्री महाराजजी द्वारा उत्तर:- भगवान से प्यार न करने के कारण आत्मशक्ति गिर गयी है इसलिए हृदय कठोर नहीं रह सकता संसार में,पिघल जाता है। यह दोष है। तो जितना भगवान की और पिघले उतना इधर कठोर हो। ऐसा balance होना चाहिए। संसार अलग है भगवान अलग है। दोनों में अलग-अलग हिसाब किताब है। चालाकी होनी चाहिए; संसार में कोई सिर काट के चरणों में रख दे तो भी यह न समझो कि यह हमारे सुख के लिए ऐसा कर रहा है। संसार में अपने स्वार्थ के लिए ही सब लोग काम करते हैं,यह सिद्धान्त को सदा याद रखो और जब भगवान के area में जा रहे हो तो वहाँ complete surrender करो। वहाँ बुद्धि लगाया कि बरबाद हुए। बड़े बड़े सरस्वती व्रहस्पति का सर्वनाश हो गया,साधारण जीव कि क्या गिनती है? तो दोनों एरिया अलग अलग हैं,अलग अलग सिद्धान्त है,अलग अलग प्रक्रियाएँ हैं।
ऐसे शब्द ज्ञानी भी गोविंद राधे।
ज्ञान दे आपु रहे कोरा बता दे ।।
भावार्थ- जिसे केवल शास्त्रीय ज्ञान है, ईश्वर का अनुभव नहीं है वह दूसरों को ज्ञान तो प्रदान कर सकता है किन्तु प्रेम के बिना वह स्वयं अज्ञानी ही बना रहता है।
शास्त्रानभिज्ञ जन गोविंद राधे।
विरक्त भी ज्ञान दे ना बता दे।।
भावार्थ- शास्त्र ज्ञान से रहित कोई यदि पूर्ण विरक्त भी है तो भी वह किसी को ज्ञान प्रदान नहीं कर सकता।
गुरु वेदवित हो गोविंद राधे।
दिव्य प्रेमयुक्त भी हो हरि ते मिला दे।।
भावार्थ- गुरु जो शास्त्रों वेदों का ज्ञाता भी हो और जिसके पास दिव्य प्रेम भी हो वही भगवत्प्राप्ति करा सकता है।
आनंदसिंधु भगवान को पाकर ही जीव सदा सदा के लिए आनंदमय हो सकता है, इसके अतिरिक्त आनंदप्राप्ति का कोई और उपाय नहीं है, नहीं है, नहीं है।
सखी! ये, दृग न दृगन सुख पाये।
निरखत ही छवि नव नीरद तनु, आनँद जल भरि आये।
पुनि बिछुरत ही श्याम सुरति करि, दृग अँसुवन झरि लाये।
दुहूँ भाँति तिय लखि न सकति पिय, बिनु देखे घबराये
विधि बुधि गइ सठियाय हाय! जो अँखियन पलक बनाये।
करि ‘कृपालु’ पिय दृग पट, पलकनि, क्यों न कपाट लगाये।।
भावार्थ:–(एक विरहिणी अपनी अन्तरंग सखी से कहती है।)
अरी सखी! इन आँखों को देखने का सुख कभी न मिला। क्योंकि जब ही नवीन बादलों की कान्ति के समान चिन्मय देह वाले श्यामसुन्दर को देखती हैं, तभी इन आँखों में आनन्द के आँसू भर आते हैं जिससे श्यामसुन्दर को नहीं देख पातीं एवं श्यामसुन्दर के वियोग में उनका स्मरण करके आँखों में जल भरा रहता है, अतएव इन आँखों को प्रियतम के दर्शन का सुख कभी नहीं मिल पाता इसके अतिरिक्त ब्रह्मा की बुद्धि भी भ्रष्ट–सी हो गयी जिसने आँखों में पलक बनाकर प्रियतम के मिलने में और भी एक व्यवधान–सा पैदा कर दिया है। ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि अरी सखी! तू इस झगड़े में क्यों पड़ती है? तू अपने प्रियतम को आँखों के कमरे में बन्द करके पलकों के किवाड़ लगाकर नित्य ही मधुर–मिलन का अनुभव किया कर।
(प्रेम रस मदिरा:-विरह–माधुरी)
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित:-राधा गोविन्द समिति।
The first step of devotion is to have full faith in your Spiritual Master and surrender to his lotus feet.
लो स्वामिनि मोहिँ अपनाय रे।
दर दर ठोकर खाऊँ तिहारोइ, दासी दास कहाय रे।
नित गुन गान करूँ तुम्हरोई, तदपि न अहमिति जाय रे।
साँची झूठ न आपुन निंदा, सुनतहिं मन हरषाय रे।
सब जानत पै मानत नाहीं, यह अचरज दरसाय रे।
तुम ‘कृपालु’ मोहिं जानति नीकी, पुनि क्यों बेर लगाय रे।।
भावार्थ:- हे स्वामिनी जी! अब तो मुझे अपना लो। तुम्हारा ही कहला कर दर-दर की ठोकर खा रहा हूँ। यद्यपि तुम्हारे ही गुणों को गाता हूँ फिर भी अहंकार नहीं जाता। अपनी झूठी सच्ची निन्दा को सुनकर मन को आनन्द नहीं मिलता। वह केवल प्रशंसा ही चाहता है। आश्चर्य तो यह है कि सब कुछ जानते हुए भी नहीं मानता। ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि हे किशोरी जी! तुम तो हृदय की जानने वाली हो फिर क्यों देर कर रही हो।

(प्रेम रस मदिरा:-दैन्य-माधुरी)
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित:-राधा गोविन्द समिति।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...