वे क्या हैं? हम नहीं जान सकते। यह तो केवल वही जान सकता है जिस पर वो कृपा करके बोध करा देते हैं। केवल इतना ही दृढ़ विश्वास बनाए रखो कि वे ही हमारे सर्वस्व हैं। सर्वसमर्थ हैं, सर्वांतर्यामी हैं और इतना ही नहीं वे तो हमारे बिलकुल अपने हैं और सदा से हम पर अकारण करुण हैं।
This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Thursday, August 15, 2019
सोलह से पच्चीस के बीच में गधी भी अपने को अप्सरा समझती है।
ओऽ! लड़के देखो, जितने ये कॉलेज के, यों अकड़ के चलते हैं और यही समझता है हर लड़का-लड़की, मेरे बराबर बस कोई नहीं है।
ये मूर्खता का सबसे बड़ा प्रमाण है।
इसीलिये, उद्धव ने भगवान् से प्रश्न किया कि संसार में मूर्ख कौन है?
उन्होंने कहा, जो अपने को देह मान ले।
बस, इससे बड़ा कोई मूर्ख नहीं।
ओऽ! लड़के देखो, जितने ये कॉलेज के, यों अकड़ के चलते हैं और यही समझता है हर लड़का-लड़की, मेरे बराबर बस कोई नहीं है।
ये मूर्खता का सबसे बड़ा प्रमाण है।
इसीलिये, उद्धव ने भगवान् से प्रश्न किया कि संसार में मूर्ख कौन है?
उन्होंने कहा, जो अपने को देह मान ले।
बस, इससे बड़ा कोई मूर्ख नहीं।
जो राधा भाव के साक्षात मूर्तिमान स्वरूप हैं,जो स्वयं महाभाव हैं,जिन के रोम-रोम से श्री कृष्ण प्रेम रस सदा टपकता रहता है,जिन के दिव्य वचन सुनते ही माया अविद्या का जाल सदा-सदा के लिये नष्ट हो जाता है,जो स्वयं प्रेम के सगुण साकार रूप हैं,जिन के अंदर-बाहर श्री कृष्ण प्रेम लबालब भरा है,जो इस धरा पे कृष्ण प्रेम दान करने के लिये अवतरित हुए हैं,ऐसे सहेज सनेही सद्गुरुदेव जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु के चरण-कमलों पर बार-बार बलिहार जाने को जी चाहता है।
जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु की जय।
जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु की जय।
जय-जय श्री राधे।
Devotion, adoration and loving remembrance of God without desiring any worldly thing from Him is called Bhakti.
#SHRI_MAHARAJJI.
#SHRI_MAHARAJJI.
रहो रे मन गौर चरन लव लाई।
जिन चरनन की चरन रेनुकहिं, सेवत श्याम सदाई।
जहँ जहँ चरन परत श्यामा को, तहँ तहँ सिर यदुराई।
चरण पलोटत रज बिच लोटत, भूरि भाग्य जनु पाई।
छिन छिन दृगन लगावत पुनि पुनि, चरनन उर लपटाई।
तुम ‘कृपालु’ कत रहे अभागे, इन चरनन बिसराई।।
जिन चरनन की चरन रेनुकहिं, सेवत श्याम सदाई।
जहँ जहँ चरन परत श्यामा को, तहँ तहँ सिर यदुराई।
चरण पलोटत रज बिच लोटत, भूरि भाग्य जनु पाई।
छिन छिन दृगन लगावत पुनि पुनि, चरनन उर लपटाई।
तुम ‘कृपालु’ कत रहे अभागे, इन चरनन बिसराई।।
भावार्थ:- रे मन! तू भी वृषभानुनंदिनी के उन कमल-कोमल-युगल-अरुण चरणों से प्रेम कर, जिन चरणों की चरण-धूलि का ब्रह्म-श्रीकृष्ण भी सेवन करते हैं। जहाँ-जहाँ किशोरी जी के युगल-चरण पड़ते हैं; वहाँ-वहाँ यादवेन्द्र श्रीकृष्ण अपना शीश रखते हैं। उन्हीं चरणों को दबाने एवं उन्हीं चरणों की धूलि में लोटने में अपना परम भाग्य समझते हैं। प्यारे श्यामसुन्दर उन्हीं चरणों को बार-बार अपने हृदय एवं अपने दोनों नेत्रों में लगाकर प्रेम-विभोर हो जाते हैं। ‘श्री कृपालु जी’ अपने लिए कहते हैं कि तुम इन अमूल्य किशोरी जी के चरणों को भुलाकर क्यों अभागे बने रहे।
(प्रेम रस मदिरा:- सिद्धान्त-माधुरी)
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज।
सर्वाधिकार सुरक्षित:- राधा गोविन्द समिति।
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज।
सर्वाधिकार सुरक्षित:- राधा गोविन्द समिति।
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