This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Thursday, August 15, 2019
गागरि मोरि मारी काँकरी।
हौं दधि बेचन जाति रही सखि! घूँघट-पट मुख ढाँक री।
तू तो जानति सखी! डगर महँ, परति खोरि इक साँकरी।
मारि दई काँकरि पाछे ते, पुनि लंपट सोँ झाँकरी।
भई विभोर यदपि लखि छलिया, तदपि न मुख ते हाँ करी।
जैसी करी ‘कृपालु’ हरी तस, अब लौं नहि कोउ ह्याँ करी।।
हौं दधि बेचन जाति रही सखि! घूँघट-पट मुख ढाँक री।
तू तो जानति सखी! डगर महँ, परति खोरि इक साँकरी।
मारि दई काँकरि पाछे ते, पुनि लंपट सोँ झाँकरी।
भई विभोर यदपि लखि छलिया, तदपि न मुख ते हाँ करी।
जैसी करी ‘कृपालु’ हरी तस, अब लौं नहि कोउ ह्याँ करी।।
भावार्थ:- एक सखी अपनी अन्तरंग सखी से कहती है अरी सखी! मैं घूँघट काढ़े हुए दही बेचने जा रही थी। तू तो जानती ही है कि मार्ग में साँकरी खोर पड़ती है, वहीं पर श्यामसुन्दर ने मेरे घड़े में पीछे से कंकड़ी मार दी एवं लंपट की तरह मेरी ओर देखने लगा। मैं भी उस छलिया को देखकर यद्यपि विभोर हो गयी फिर भी मुख से कुछ स्वीकार नहीं किया। ‘श्री कृपालु जी’ के शब्दों में सखी कहती है कि जैसी अंधेर श्यामसुन्दर ने की, ऐसी आज तक ब्रज में किसी ने नहीं की।
(प्रेम रस मदिरा:- मिलन-माधुरी)
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज।
सर्वाधिकार सुरक्षित:- राधा गोविन्द समिति।
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज।
सर्वाधिकार सुरक्षित:- राधा गोविन्द समिति।
सोलह से पच्चीस के बीच में गधी भी अपने को अप्सरा समझती है।
ओऽ! लड़के देखो, जितने ये कॉलेज के, यों अकड़ के चलते हैं और यही समझता है हर लड़का-लड़की, मेरे बराबर बस कोई नहीं है।
ये मूर्खता का सबसे बड़ा प्रमाण है।
इसीलिये, उद्धव ने भगवान् से प्रश्न किया कि संसार में मूर्ख कौन है?
उन्होंने कहा, जो अपने को देह मान ले।
बस, इससे बड़ा कोई मूर्ख नहीं।
ओऽ! लड़के देखो, जितने ये कॉलेज के, यों अकड़ के चलते हैं और यही समझता है हर लड़का-लड़की, मेरे बराबर बस कोई नहीं है।
ये मूर्खता का सबसे बड़ा प्रमाण है।
इसीलिये, उद्धव ने भगवान् से प्रश्न किया कि संसार में मूर्ख कौन है?
उन्होंने कहा, जो अपने को देह मान ले।
बस, इससे बड़ा कोई मूर्ख नहीं।
जो राधा भाव के साक्षात मूर्तिमान स्वरूप हैं,जो स्वयं महाभाव हैं,जिन के रोम-रोम से श्री कृष्ण प्रेम रस सदा टपकता रहता है,जिन के दिव्य वचन सुनते ही माया अविद्या का जाल सदा-सदा के लिये नष्ट हो जाता है,जो स्वयं प्रेम के सगुण साकार रूप हैं,जिन के अंदर-बाहर श्री कृष्ण प्रेम लबालब भरा है,जो इस धरा पे कृष्ण प्रेम दान करने के लिये अवतरित हुए हैं,ऐसे सहेज सनेही सद्गुरुदेव जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु के चरण-कमलों पर बार-बार बलिहार जाने को जी चाहता है।
जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु की जय।
जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु की जय।
जय-जय श्री राधे।
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