Sunday, August 28, 2011

"IT IS IMPOSSIBLE TO PURIFY THE MIND WITHOUT DEVOTION TO SHRI KRISHNA".
YOUR ULTIMATE GOAL IS THE ATTAINMENT OF DIVINE LOVE OF SHRI KRISHNA AND HIS ETERNAL SERVICE.------SHREE MAHARAJJI.
THE PERFECTION OF SPIRITUAL LIFE IS TO PERCEIVE SHRI KRISHNA IN ALL OBJECTS OF THE WORLD-ANIMATE AS WELL AS INANIMATE.-----JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ.
SPIRITUAL PRACTICE IS POSSIBLE ONLY UNDER THE GUIDANCE OF A TRUE SAINT OR MASTER.
-----SHREE KRIPALU MAHAPRABHU.
EVERY DEVOTIONAL PRACTICE IS RELATED ONLY TO MIND.ANY SPIRITUAL DISCIPLINE PRACTISED MERELY WITH SENSES IS NOT SPIRITUAL DISCIPLINE AT ALL.
------JAGADGURUTTAM SHRI KRIPALU JI MAHAPRABHU.
THERE ARE ONLY TWO AREAS IN THE WORLD.ONE IS DIVINE,SATYA AND THE OTHER IS MATERIAL,ASATYA. GOD AND HIS SAINTS WHO ARE BEYOND MAYA ALONE ARE 'SATYA'.ASSOCIATION WITH THEM THROUGH THE COMPLETE INVOLVEMENT OF THE MIND AND INTELLECT IS REFERRED TO AS 'SATSANGA', 'DIVINE ASSOCIATION'.ANYTHING OR ANYONE ELSE APART FROM THIS NATURALLY COMES UNDER THE THREE MODES OF MAYA-'TAMASA','RAJASA' AND 'SATTVA'.TH...EREFORE,ASSOCIATION WITH THIS AREA IS REFERRED TO AS 'KUSANGA','MATERIAL ASSOCIATION'.IN SHORT,WHATEVER LEADS TO THE ATTACHMENT OF THE MIND AND INTELLECT TO THE DIVINE IS "SATSANGA",APART FROM THIS,EVERYTHING ELSE IS "KUSANGA" OR 'WRONG ASSOCIATION'.
........JAGADGURU SHREE KRIPALUJI MAHAPRABHU.
------FROM THE BOOK:PREM RAS SIDDHANTHA(PHILOSOPHY OF DIVINE LOVE).COPYRIGHT@2009.
JAGADGURU KRIPALU PARISHAT.ALL RIGHTS RESERVED.
चलो मन ! श्री वृंदावन धाम |
जहँ विहरत नागरि अरु नागर, कुँ जनि आठों याम |
भूख लगे तो रसिकन जूठनि, खाइ लहिय विश्राम |
प्यास लगे तो तरणि-तनूजा, तट पिवु सलिल ललाम |
नींद लगे तो जाइ सोइ रहु, लतन-कुंज अभिराम |
...ब्रज की रेनु रेनु लखि चिन्मय, तन्मय रहु अविराम |
पै ‘कृपालु’ मन ! जनि यह भूलिय, भाव रहे निष्काम ||


भावार्थ- हे मन ! तू दिव्य चिन्मय वृन्दावन-धाम में चल, जहाँ लाड़िली और लाल विविध कुंजों में आठों याम विहार किया करते हैं | यदि तुझे भूख लगे तो महापुरुषों की जूठन खाकर सुखी होना | जब प्यास लगे, यमुना का निर्मल जल पी लिया करना | जब सोने की इच्छा हो तब स्वाभाविक बने हुए लताओं के कुंज घरों में सो जाया करना | अरे मन ! ब्रज के प्रत्येक कण-कण में चिन्मय-स्वरूप देखते हुए सदा ही तन्मय रहा करना | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि हे मन ! किन्तु यह न भूलना कि इन सब में तेरा भाव निष्काम रहे |

(प्रेम रस मदिरा धाम-माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...