Wednesday, April 17, 2013

अगर कोई सोचता है- मैं अभागा हूँ। यह भगवान अथवा गुरु के प्रति सबसे बड़ी अकृतज्ञता है। कोई समर्थ गुरु मिल गया तो। भगवान की कृपा की तो यह अंतिम सीमा हो गयी।
------श्री महाराजजी।
अगर कोई सोचता है- मैं अभागा हूँ। यह भगवान अथवा गुरु के प्रति सबसे बड़ी अकृतज्ञता है। कोई समर्थ गुरु मिल गया तो। भगवान की कृपा की तो यह अंतिम सीमा हो गयी।
 ------श्री महाराजजी।

 

No comments:

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...