Monday, May 20, 2019

मानव होकर के हम निराशा का चिन्तन करें,इससे बड़ा कोई अपराध नहीं है,अविवेक नहीं है। जो प्राप्त वस्तु है उसका अनादर करने से निराशा आती है।
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज

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मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...